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धन्य है आपकी गुरुभक्ति !

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धन्य है आपकी गुरुभक्ति !

संत आशाराम बापू जी के भक्तो का कहेना ही क्या !

जिस सड़क से सदगुरुदेव भगवान की  गाड़ी गुजरी उस सड़क को भी प्रणाम !

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गुरु पुष्यामृत योग (16 जनवरी दोपहर 1:14 से 17 जनवरी सूर्योदय तक)

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‘शिव पुराण’ में पुष्य नक्षत्र को भगवान शिव की विभूति बताया गया है | पुष्य नक्षत्र के प्रभाव से अनिष्ट-से-अनिष्टकर दोष भी समाप्तप्राय और निष्फल-से हो जाते हैं, वे हमारे लिए पुष्य नक्षत्र के पूरक बनकर अनुकूल फलदायी हो जाते हैं | ‘सर्वसिद्धिकर: पुष्य: |’ इस शास्त्रवचन के अनुसार पुष्य नक्षत्र सर्वसिद्धिकर है | पुष्य नक्षत्र में किये गए श्राद्ध से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है तथा कर्ता को धन, पुत्रादि की प्राप्ति होती है |

देवगुरु बृहस्पति ग्रह का उद्भव पुष्य नक्षत्र से हुआ था, अत: पुष्य व बृहस्पति का अभिन्न संबंध है | पुष्टिप्रदायक पुष्य नक्षत्र का वारों में श्रेष्ठ बृहस्पतिवार (गुरुवार) से योग होने पर वह अति दुर्लभ ‘गुरुपुष्यामृत योग’ कहलाता है |

गुरौ पुष्यसमायोगे सिद्धयोग: प्रकीर्तित: |

शुभ, मांगलिक कर्मों के संपादनार्थ गुरु-पुष्यामृत योग वरदान सिद्ध होता है |
इस योग में किया गया जप, ध्यान, दान, पुण्य महाफलदायी होता है परंतु पुष्य में विवाह व उससे संबधित सभी मांगलिक कार्य वर्जित हैं |

#Bail4Bapuji – प्रार्थना का प्रभाव – #BAPUJI

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#JUSTICE4BAPUJI - प्रार्थना का प्रभाव - #BAPUJI

सन् 1956 में मद्रास इलाके में अकाल पड़ा। पीने का पानी मिलना भी दुर्लभ हो गया। वहाँ का तालाब ‘रेड स्टोन लेक’ भी सूख गया। लोग त्राहिमाम् पुकार उठे। उस समय के मुख्यमंत्री श्री राजगोपालाचारी ने धार्मिक जनता से अपील की कि ‘सभी लोग दरिया के किनारे एकत्रित होकर प्रार्थना करें।’ सभी समुद्र तट पर एकत्रित हुए। किसी ने जप किया तो किसी ने गीता का पाठ, किसी ने रामायण की चौपाइयाँ गुंजायी तो किसी ने अपनी भावना के अनुसार अपने इष्टदेव की प्रार्थना की। मुख्यमंत्री ने सच्चे हृदय से, गदगद कंठ से वरुणदेव, इन्द्रदेव और सबमें बसे हुए आदिनारायण विष्णुदेव की प्रार्थना की। लोग प्रार्थना करके शाम को घर पहुँचे। वर्षा का मौसम तो कब का बीत चुका था। बारिश का कोई नामोनिशान नहीं दिखाई दे रहा था। ‘आकाश मे बादल तो रोज आते और चले जाते हैं।’ – ऐसा सोचते-सोचते सब लोग सो गये। रात को दो बजे मूसलाधार बरसात ऐसी बरसी, ऐसी बरसी कि ‘रेड स्टोन लेक’ पानी से छलक उठा। बारिश तो चलती ही रही। यहाँ तक कि मद्रास सरकार को शहर की सड़कों पर नावें चलानी पड़ीं। दृढ़ विश्वास, शुद्ध भाव, भगवन्नाम, भगवत्प्रार्थना छोटे-से-छोटे व्यक्ति को भी उन्नत करने में सक्षम है। महात्मा गाँधी भी गीता के पाठ, प्रार्थना और रामनाम के स्मरण से विघ्न-बाधाओं को चीरते हुए अपने महान उद्देश्य में सफल हुए, यह दुनिया जानती है। प्रार्थना करो…. जप करो… ध्यान करो… ऊँचा संग करो… सफल बनो, अपने आत्मा-परमात्मा को पहचान कर जीवनमुक्त बनो।

SAFLA EKADASHI (सफला एकादशी)

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SAFLA EKADASHI   (सफला एकादशी)

सफला एकादशी
युधिष्ठिर ने पूछा : स्वामिन् ! पौष मास के कृष्णपक्ष (गुज., महा. के लिए मार्गशीर्ष) में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है? उसकी क्या विधि है तथा उसमें किस देवता की पूजा की जाती है ? यह बताइये ।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : राजेन्द्र ! बड़ी बड़ी दक्षिणावाले यज्ञों से भी मुझे उतना संतोष नहीं होता, जितना एकादशी व्रत के अनुष्ठान से होता है । पौष मास के कृष्णपक्ष में ‘सफला’ नाम की एकादशी होती है । उस दिन विधिपूर्वक भगवान नारायण की पूजा करनी चाहिए । जैसे नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़ तथा देवताओं में श्रीविष्णु श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण व्रतों में एकादशी तिथि श्रेष्ठ है ।
राजन् ! ‘सफला एकादशी’ को नाम मंत्रों का उच्चारण करके नारियल के फल, सुपारी, बिजौरा तथा जमीरा नींबू, अनार, सुन्दर आँवला, लौंग, बेर तथा विशेषत: आम के फलों और धूप दीप से श्रीहरि का पूजन करे । ‘सफला एकादशी’ को विशेष रुप से दीप दान करने का विधान है । रात को वैष्णव पुरुषों के साथ जागरण करना चाहिए । जागरण करनेवाले को जिस फल की प्राप्ति होती है, वह हजारों वर्ष तपस्या करने से भी नहीं मिलता ।
नृपश्रेष्ठ ! अब ‘सफला एकादशी’ की शुभकारिणी कथा सुनो । चम्पावती नाम से विख्यात एक पुरी है, जो कभी राजा माहिष्मत की राजधानी थी । राजर्षि माहिष्मत के पाँच पुत्र थे । उनमें जो ज्येष्ठ था, वह सदा पापकर्म में ही लगा रहता था । परस्त्रीगामी और वेश्यासक्त था । उसने पिता के धन को पापकर्म में ही खर्च किया । वह सदा दुराचारपरायण तथा वैष्णवों और देवताओं की निन्दा किया करता था । अपने पुत्र को ऐसा पापाचारी देखकर राजा माहिष्मत ने राजकुमारों में उसका नाम लुम्भक रख दिया। फिर पिता और भाईयों ने मिलकर उसे राज्य से बाहर निकाल दिया । लुम्भक गहन वन में चला गया । वहीं रहकर उसने प्राय: समूचे नगर का धन लूट लिया । एक दिन जब वह रात में चोरी करने के लिए नगर में आया तो सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया । किन्तु जब उसने अपने को राजा माहिष्मत का पुत्र बतलाया तो सिपाहियों ने उसे छोड़ दिया । फिर वह वन में लौट आया और मांस तथा वृक्षों के फल खाकर जीवन निर्वाह करने लगा । उस दुष्ट का विश्राम स्थान पीपल वृक्ष बहुत वर्षों पुराना था । उस वन में वह वृक्ष एक महान देवता माना जाता था । पापबुद्धि लुम्भक वहीं निवास करता था ।
एक दिन किसी संचित पुण्य के प्रभाव से उसके द्वारा एकादशी के व्रत का पालन हो गया । पौष मास में कृष्णपक्ष की दशमी के दिन पापिष्ठ लुम्भक ने वृक्षों के फल खाये और वस्त्रहीन होने के कारण रातभर जाड़े का कष्ट भोगा । उस समय न तो उसे नींद आयी और न आराम ही मिला । वह निष्प्राण सा हो रहा था । सूर्योदय होने पर भी उसको होश नहीं आया । ‘सफला एकादशी’ के दिन भी लुम्भक बेहोश पड़ा रहा । दोपहर होने पर उसे चेतना प्राप्त हुई । फिर इधर उधर दृष्टि डालकर वह आसन से उठा और लँगड़े की भाँति लड़खड़ाता हुआ वन के भीतर गया । वह भूख से दुर्बल और पीड़ित हो रहा था । राजन् ! लुम्भक बहुत से फल लेकर जब तक विश्राम स्थल पर लौटा, तब तक सूर्यदेव अस्त हो गये । तब उसने उस पीपल वृक्ष की जड़ में बहुत से फल निवेदन करते हुए कहा: ‘इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान विष्णु संतुष्ट हों ।’ यों कहकर लुम्भक ने रातभर नींद नहीं ली । इस प्रकार अनायास ही उसने इस व्रत का पालन कर लिया । उस समय सहसा आकाशवाणी हुई: ‘राजकुमार ! तुम ‘सफला एकादशी’ के प्रसाद से राज्य और पुत्र प्राप्त करोगे ।’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर उसने वह वरदान स्वीकार किया । इसके बाद उसका रुप दिव्य हो गया । तबसे उसकी उत्तम बुद्धि भगवान विष्णु के भजन में लग गयी । दिव्य आभूषणों से सुशोभित होकर उसने निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया और पंद्रह वर्षों तक वह उसका संचालन करता रहा । उसको मनोज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । जब वह बड़ा हुआ, तब लुम्भक ने तुरंत ही राज्य की ममता छोड़कर उसे पुत्र को सौंप दिया और वह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के समीप चला गया, जहाँ जाकर मनुष्य कभी शोक में नहीं पड़ता ।
राजन् ! इस प्रकार जो ‘सफला एकादशी’ का उत्तम व्रत करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर मरने के पश्चात् मोक्ष को प्राप्त होता है । संसार में वे मनुष्य धन्य हैं, जो ‘सफला एकादशी’ के व्रत में लगे रहते हैं, उन्हीं का जन्म सफल है । महाराज ! इसकी महिमा को पढ़ने, सुनने तथा उसके अनुसार आचरण करने से मनुष्य राजसूय यज्ञ का फल पाता है ।

LAKHO – KARODO KI MA LAXMIDEVI JI KE UDGAAR (लाखो – करोड़ो की माँ लक्ष्मी देवी जी के उदगार) …………..

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LAKHO – KARODO KI MA LAXMIDEVI JI KE UDGAAR

(लाखो – करोड़ो की माँ लक्ष्मी देवी जी के उदगार)

श्री हरी की प्रकृति जब करवट लेगी….. तो बहुत बहुत भारी पड़ जायेगी । #WhySoBiased?

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श्री हरी की प्रकृति जब करवट लेगी….. तो बहुत बहुत भारी पड़ जायेगी । #WhySoBiased?

संत आशारामजी बापू के खिलाफ जोधपुर और सूरत में घृणास्पद आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज करवायी गयी यह बात आप सबको मालूम है । लेकिन एफआईआर में क्या लिखा है, कितनी सच्चाई है, उसमें कितनी झूठी बातें हैं – यह बात एफआईआर पढ़ने पर ही पता चल जाती है ।
पहले हम उत्तर प्रदेश की लड़की द्वारा दिल्ली में दर्ज की हुई एफआईआर का परीक्षण करेंगे । वह लड़की खुद को नाबालिग बताती है और उसी समय यह भी कहती है कि ‘मैं १२वीं कक्षा में पढ़ती हूँ ।’ ७वीं कक्षा में लड़की ने दो साल गुजारे हैं, विद्यालय का रिकॉर्ड इसका प्रमाण है । इस हिसाब से पहली कक्षा में प्रवेश लेते समय लड़की की उम्र ५ साल भी नहीं हो रही है, जबकि प्रवेश के लिए ६ साल या कम-से-कम ५ साल उम्र होना जरूरी है । वह बालिग है या नाबालिग है, यह ढूँढ़ने की कोशिश जोधपुर पुलिस या किसी चैनल ने नहीं की ।
पाकिस्तान में रहनेवाला अजमल कसाब खुद को नाबालिग कहता था । उसका स्कूल प्रमाण-पत्र या जन्म प्रमाण-पत्र पाना मुमकिन नहीं था । कसाब पाकिस्तानी है – यह बात पाकिस्तान मानने को तैयार नहीं था । भारत के डॉक्टरों ने उसकी शारीरिक जाँच की और उसके बाद वह नाबालिग नहीं बालिग है – ऐसा निर्णय दिया, फिर मुकदमा हुआ । जोधपुर के केस में लड़की बालिग है या नाबालिग – इसकी मेडिकल जाँच होना अत्यावश्यक है । अहम बात यह है कि लड़की नाबालिग होने से गैर-जमानती ‘पॉक्सो एक्ट’ लागू होती है, जो आशारामजी बापू को फँसाने की साजिश का एक भाग है ।
साजिश का अगला कदम था बापूजी और श्री नारायण साँर्इं पर सूरत में दो सगी बहनों को मोहरा बनाकर लगवाया गया बलात्कार और यौन-शोषण का आरोप । ये दोनों बहनें शादीशुदा हैं । इनमें से बड़ी बहन (उम्र ३३) ने बापूजी पर और छोटी बहन (उम्र ३०) ने नारायण साँर्इं पर आरोप लगाया है । लेकिन उनकी एफआईआर ही उनके झूठ और उनके साथ मिले हुए षड्यंत्रकारियों की सुनियोजित साजिश की पोल खोल देती है । आइये, नजर डालें उनमें लिखे कुछ पहलुओं पर :
बड़ी बहन का कहना है कि उसके साथ सन् २००१ में तथाकथित घटना घटी थी । २००२ में उसकी छोटी बहन आश्रम में रहने के लिए आयी थी । अगर किसी लड़की के साथ कहीं बलात्कार हुआ हो तो क्या वह चाहेगी कि उसकी छोटी बहन भी ऐसी जगह पर रहने आये ? कदापि नहीं । सवाल उठता है कि इसने अपनी छोटी बहन को आश्रम में आने से मना क्यों नहीं किया ? अगर वह सच कहने से डर भी रही थी तो वह कुछ भी बहाना बनाकर उसे आश्रम में आने से मना कर सकती थी । पर ऐसा नहीं हुआ, क्यों ?
कोई भी कुलीन स्त्री बलात्कार करनेवाले पुरुष से घृणा करने लगती है, उससे दूर जाने का प्रयास करती है, भले ही पुलिस में शिकायत न की हो । लेकिन यहाँ तो इस महिला (बड़ी बहन) का बापूजी के प्रति बर्ताव हमेशा अच्छा ही रहा था । एफआईआर में उसने जो बहुत गंदी बात लिखी है, वह अगर सच होती तो उस महिला से आश्रम छोड़ना अपेक्षित था लेकिन लड़की आश्रम की वक्ता बनी, प्रवचन किये, मंच पर से हजारों भक्तों के सामने बापूजी के गुणगान गाती रही । इसका मतलब यही है कि वह जो दुष्कर्म की बात कहती है ऐसा कुछ हुआ ही नहीं ।
बड़ी बहन कहती है कि ‘‘२००१ में बलात्कार की घटना के बाद मैं बहुत डर गयी थी और आश्रम से भागना चाहती थी पर अवसर नहीं मिला ।’’ जबकि स्वयं उसने ही एफआईआर में लिखवाया है कि ‘‘उसका दूसरे शहरों में भी आना-जाना चालू रहता था ।’’ वास्तविकता यह है कि प्रवचन करने हेतु वह विभिन्न राज्यों के कई छोटे-मोटे शहर जैसे – बड़ौदा, नड़ियाद, आणंद, भरूच, मेहसाणा तथा लुधियाना, राजपुरा, अमरावती, अहमदनगर आदि में अनेकों बार गयी थी । यहाँ तक कि वह सूरत में, जहाँ उसके पिता का घर है, वहाँ भी कई बार गयी । जब उसे टी.बी. की बीमारी हुई थी, तब भी वह घर गयी थी । तो क्या उसे ६ सालों तक किसी भी जगह से भागने का अवसर नहीं मिला होगा ? घरवालों को या पुलिस को बताने का अवसर नहीं मिला होगा ? उसे युक्तिपूर्वक भागने की आवश्यकता क्यों पड़ी ?
बड़ी बहन ने एफआईआर में कहा है कि ‘तथाकथित बलात्कार के बाद उसे गाड़ी में ले जाकर शालिग्राम बिल्डिंग के पास छोड़ा गया था और वहाँ से वह पैदल महिला आश्रम पहुँची ।’ शालिग्राम से महिला आश्रम आधा कि.मी. दूरी पर है । अगर लड़की की कहानी सत्य होती तो उसके पास वहीं से भागकर जाने का पर्याप्त मौका होते हुए भी वह वहाँ से क्यों नहीं भागी ? शालिग्राम के आसपास कई घर हैं, दुकानें हैं और वहाँ लोगों की भीड़ भी रहती है । ऐसे में वह घर भी जा सकती थी, किसीको मदद के लिए पुकार भी सकती थी, वहाँ से पुलिस स्टेशन भी जा सकती थी । उसने इसमें से कुछ भी क्यों नहीं किया ?
छोटी बहन ने आरोप लगाया है कि २००२ में सूरत में बापूजी की कुटिया में नारायण साँर्इंजी ने उसके साथ दुष्कर्म किया । उसके बाद वह घर चली गयी और फिर दूसरे ही दिन साँर्इंजी के हिम्मतनगर स्थित महिला आश्रम में चली गयी, जिसका कारण वह बताती है कि साँर्इं ने फोन करके वहाँ जाने को कहा था ।
पहली बात, साँर्इं कभी बापूजी की कुटिया में नहीं रुकते । दूसरी सोचनेवाली बात है कि एक दिन उसके साथ दुष्कर्म हुआ और वह घर चली गयी और दूसरे दिन उन्हींके फोन पर, वह अपने घर जैसी सुरक्षित जगह को छोड़कर उनके आश्रम चली गयी और २ साल तक बड़े श्रद्धा-निष्ठा, समर्पणभाव से बतौर संचालिका वहाँ सेवाएँ सँभालीं । इसीसे साबित होता है कि उसके साथ कभी भी किसी तरह का दुष्कर्म हुआ ही नहीं और यह सिर्फ लोभवश साँर्इंजी के पवित्र दामन को कलंकित करने की सोची-समझी साजिश है ।
छोटी बहन के अनुसार जब वह पुनः आश्रम में गयी तो उसके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई तो उसकी श्रद्धा फिर बैठ गयी और फिर २ साल तक उसके संचालिका पद पर कार्यरत रहने पर साँर्इं के आने पर हर बार उसके साथ दुष्कर्म होता रहा । ये सारी बातें बेतुकी और हास्यास्पद हैं कि २ दिन छेड़खानी नहीं हुई तो श्रद्धा फिर टिक गयी और फिर २ साल तक तथाकथित दुष्कर्म सहती हुई उनके आश्रम में टिकी रही ! जबकि हिम्मतनगर (गुज.) के गाम्भोई गाँव में बसे इतने खुले आश्रम से निकल जाने का मौका उसे कैसे नहीं मिला ? यही नहीं, उस महिला की स्थानीय लोगों से अच्छी जान-पहचान थी और उसका कई बार शहर और बाजार आना-जाना लगा रहता था ।
छोटी बहन के अनुसार २००४ में वह आश्रम से उसके घर चली गयी थी और २०१० में उसकी शादी हो गयी । तब भी उसने माँ-बाप को ऐसा कुछ नहीं बताया और १ अक्टूबर २०१३ को ही उसने पहली बार पति को बताया और ६ अक्टूबर २०१३ को एफआईआर दर्ज की गयी । यह कैसे सम्भव है कि पीड़ित महिला ११ वर्षों तक अपने किसी सगे-संबंधी को अपनी व्यथा न बताये ! सालों बाद आरोप लगाने से मेडिकल जाँच तो हो नहीं सकती । बलात्कार के केस में मेडिकल रिपोर्ट की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है ।
छोटी बहन के मुताबिक ‘दुष्कर्म के बाद उसने नारायण साँर्इं के एक आश्रम की संचालिका का पद सँभाला । २ साल यह पद सँभालने के बाद वह आश्रम छोड़ के घर चली गयी । आश्रम की प्रमुख होने के नाते हिसाब-किताब पूरा करना जरूरी था इसलिए नारायण साँर्इं ने उसे फोन पर आने को कहा । हिसाब देने के लिए वह घर से निकली और बीच में अपने किसी परिचित के घर रात को रुकी । वहाँ से वह आश्रम जानेवाली थी और यह बात उसने नारायण साँर्इं को फोन द्वारा बतायी भी थी ।’ आगे यह महिला लिखवाती है कि ‘आश्रम द्वारा भेजी ६-७ महिलाओं ने सुबह के ढाई बजे उसके परिचित के घर पर पथराव किया, जिससे वह डर के वापस अपने घर चली गयी ।’ कैसी बोगस बातें हैं ! पथराव की बात सत्य होती तो मकान मालिक अथवा तो पड़ोसियों ने पुलिस में शिकायत की होती । पथराव हुआ इसका कोई सबूत नहीं है । अगर नारायण साँर्इं को इसे आश्रम बुलाना होता और जब यह खुद जाने को तैयार थी तो वे इसके घर पर पथराव भला क्यों करवाते ? इतनी समझ तो किसी साधारण आदमी को भी होती है ।
छोटी बहन २००५ में आश्रम छोड़कर घर चली गयी थी । फिर भी बड़ी बहन ने उससे आश्रम छोड़ने का कारण नहीं पूछा और छोटी बहन ने भी अपनी बड़ी बहन को उसके आश्रम छोड़ने की वजह बताने की जरूरत नहीं समझी । क्या ऐसा सगी बहनों के रिश्ते में कभी हो सकता है ?
छोटी बहन बोलती है कि ‘‘मैं डर के मारे झूठ बोलकर आश्रम से चली गयी । उसके ८ दिन बाद किसी महिला द्वारा संदेश मिलने पर मैंने नारायण साँर्इं को फोन किया ।’’ लेकिन जब वह आश्रम छोड़कर चली गयी थी तो किसी महिला द्वारा मात्र एक संदेश मिलने पर उसने सामने से नारायण साँर्इं को फोन क्यों लगाया ? इससे पता चलता है कि ऐसी कोई घटना घटी ही नहीं थी ।
दोनों बहनों ने एफआईआर में लिखवाया है कि ‘‘हम उनके धाक और प्रभाव के कारण किसीको कह नहीं पाते थे, आज तक किसीको नहीं कहा ।’’ २००८ में गुजरात के समाचार-पत्रों में सरकार ने छपवाया था कि आश्रम द्वारा कोई भी पीड़ित व्यक्ति अगर शिकायत करे तो पुलिस उसके घर जाकर उसकी शिकायत दर्ज करेगी और उसका नाम भी गोपनीय रखा जायेगा । ऐसा होने पर भी ये बहनें सामने क्यों नहीं आयीं ? अचम्भे की बात है कि बापूजी का तथाकथित धाक होने के बावजूद भी दोनों बहनों को आश्रम से जाने के ६-८ साल बाद, आज तक भी किसी प्रकार की कोई भी धमकी या नुकसान नहीं पहुँचा, उनके साथ सम्पर्क भी नहीं किया गया । जबकि बलात्कार करनेवाला व्यक्ति, जिसके देश-विदेश में करोड़ों जानने-माननेवाले हों, उसे तो सतत यह डर होना चाहिए कि ‘कहीं यह बाहर जाकर मेरी पोल न खोल दे ।’ इसके विपरीत बापूजी और नारायण साँर्इं को तो ऐसा कोई डर कभी था ही नहीं ।
गाँववालों से तफतीश करने पर पता चला कि दोनों लड़कियाँ आश्रम छोड़ने के बाद भी सत्संग में जाती थीं । और तो और, २०१३ में भी बारडोली (गुज.) में छोटी बहन साँर्इंजी के दर्शन करने आयी थी और उसके फोटोग्राफ एवं विडियो भी अदालत में प्रस्तुत किये गये हैं, जिसमें स्पष्ट दिख रहा है कि पति-पत्नी दोनों बड़े श्रद्धाभाव से साँर्इंजी के दर्शन कर रहे हैं । तो सोचने की बात है कि क्या कोई अपने साथ वर्षों तक दुष्कर्म और यौन-शोषण करनेवाले के प्रति इतनी निष्ठा व पूज्यभाव रख सकता है ?
अगर कोई सामान्य व्यक्ति भी एफआईआर के इन पहलुओं पर गौर करे तो यह स्पष्ट होने लगता है कि संत आशारामजी बापू और उनके सुपुत्र श्री नारायण साँर्इं को एक बड़ी साजिश के तहत फँसाया जा रहा है । ऐसे और भी कई पहलू हैं । कृपालुजी महाराज, स्वामी केशवानंदजी, स्वामी नित्यानंदजी आदि संतों के बाद पूज्य बापूजी व नारायण साँर्इं पर इस प्रकार के झूठे लांछन भारतीय संस्कृति पर प्रहार हैं । जब उपरोक्त संतों पर झूठे आरोप हुए तब तो उन आरोपों को खूब बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया किन्तु जब ये निर्दोष साबित हुए तब मीडिया द्वारा उसे जनता तक क्यों नहीं पहुँचाया गया ? यही बात पूज्य बापूजी के खिलाफ रचे गये अब तक के सभी षड्यंत्रों की पोल खुलने पर भी होती आयी है ।
इतने सारे झूठ अपने-आपमें काफी हैं किसी भी प्रबुद्ध व्यक्ति को सच्चाई समझने के लिए । क्योंकि जो सच बोलता है या लिखता है उससे ऐसी गलतियाँ कभी नहीं हो सकतीं । लेकिन जब मनगढ़ंत और झूठी कहानी पेश करनी होती है तो वहाँ कौन मौजूद था, कौन नहीं, क्या हुआ ? इसमें अक्सर गलतियाँ हो जाती हैं । अतः मेरी सभी देशवासियों से अपील है कि वे अपने स्वविवेक का उपयोग करके सत्य को देखें, न कि मीडिया के चश्मे से ।