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श्रद्धा की रक्षा

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shraddha ki raksha
Sant Asaramji Bapu

श्रद्धा मन का विषय है और मन चंचल है । मनुष्य जब सत्त्वगुण में होता है, तब श्रद्धा पुष्ट होती है ।

सत्त्वगुण बढ़ता है सात्त्विक आहार-विहार से, सात्त्विक वातावरण में रहने से एवं सत्संग सुनने से । मनुष्य जब रजो-तमोगुणी जीवन जीता है, तो मति नीचे के केन्द्रों में, हलके केन्द्रो में पहुँच जाती है । मति जब नीचे चली जाती है, तब लगता है कि झूठ बोलने में, कपट करने में सार है, कोर्ट कचहरी जाना चाहिए… आदि-आदि ।

श्रद्धा बनी रहे उसके लिए क्या करना चाहिए ? अपनी श्रद्धा, स्वास्थ्य और सूझबूझ को बुलंद बनाये रखने एवं विकसित करने के लिए अपना आहार शुद्ध रखें । यदि असात्त्विक आहार के कारण मन में जरा भी मलिनता आती है तो श्रद्धा घटने लगती है । अत: श्रद्धा को बनाये रखने के लिए आहार शुद्धि का ध्यान रखें ।

पवित्र संग करें, सत्संग में जायें एवं पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करें ।

संसार सागर से पार कैसे हो ?

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Sant Asharamji Bapu

भक्ति के अनेक प्रकार बतलाये गए हैं, परन्तु नारदजी जिस भक्ति की व्याख्या करते हैं वह प्रेम स्वरूपा है। भगवान् में अनन्य प्रेम हो जाना ही भक्ति है। ज्ञान, कर्म आदि साधनों के आश्रय से रहित और सब ओर से स्पृहाशून्य होकर चित्तवृति अनन्य भाव से जब केवल भगवान् में ही लग जाती है; जगत के समस्त पदार्थों से तथा परलोक की समस्त सुख-सामग्रियों से, यहाँ तक कि मोक्ष-सुख से भी चित्त हटकर एकमात्र अपने परम प्रेमास्पद भगवान् में लगा रहता है, सारी ममता और आसक्ति सब पदार्थों से सर्वथा निकलकर एकमात्र प्रियतम भगवान् के प्रति हो जाती है, तब उस स्थिति को ‘अनन्य प्रेम’ कहते हैं।
अमृतस्वरूपा च।।
भगवान् में अनन्य प्रेम ही वास्तव में अमृत है; वह सबसे अधिक मधुर है और जिसको यह प्रेमामृत मिल जाता है वह उसे पानकर अमर हो जाता है। लौकिक वासना ही मृत्यु है। अनन्य प्रेमी भक्त के ह्रदय में भगवत्प्रेम की एक नित्य नवीन, पवित्र वासना के अतिरिक्त दूसरी कोई वासना रह ही नहीं जाती। इसी परम दुर्लभ वासना के कारण वह भगवान् की मुनिमनहारिणी लीला का साधन बनकर कर्मबन्धन युक्त जन्म-मृत्यु के चक्कर से सर्वथा छूट जाता है। वह सदा भगवान् के समीप निवास करता है और भगवान् उसके समीप।प्रेमी भक्त और प्रेमास्पद भगवान् का यह नित्य अटल संयोग ही वास्तविक अमरत्व है। इसी से भक्तजन मुक्ति न चाहकर भक्ति चाहते हैं।

भक्ति करे कोई सूरमा

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भक्ति करे कोई सूरमा जाति वरण कुल खोय।
कामी क्रोधी लालची उनसे भक्ति न होय।।
बार-बार सत्संग करने से भक्ति पुष्ट होती है। साधन-भजन से सत्संग में रूचि होती है। सत्संग करने से साधन में रूचि होती है। जैसे मेघ सरोवर को पुष्ट करता है और सरोवर मेघ को पुष्ट करता है वैसे ही सत्संग साधन को पोसता है और साधन सत्संग को पोसता है

क्या है आपकी श्रद्धा का आधार ?

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आपकी श्रद्धा का आधार आपका अनुभव होना चाहिए | पूरी दुनिया और मीडियावाले कहे कि सूर्य अँधेरा फैलाता है, पानी से आग बढती है और पेट्रोल से आग शांत होती है, चिंटी हाथी से बड़ी होती है और चूहा शेर का शिकार कर सकता है तो क्या आप मान लोगे ? प्रमाण तो आधुनिक टेक्नोलोजी का उपयोग करके जैसे चाहो बना सकते है | बुद्ध को व्यभिचारी सिद्ध करने के लिए जेतवन में बुद्ध के निवास के पास से निंदकों ने बलात्कार करके एक वैश्या को मार कर गाड़ दी | बाद में वहाँ खोद कर प्रमाण दिखाया लोगों को क्या ऐसे प्रमाण आज का निंदक नहीं बना सकता ? मेरी श्रद्धा मेरे अनुभव पर आधारित है उसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी नहीं हिला सकते तो दूसरों की क्या बात है ?