संत

संतों की दया

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Santon Ki Daya
Asaramji Bapu

उन महात्माओं में कठोरता, वैर और द्वेष का तो नाम ही नहीं रहता! वे इतने दयालु होते हैं कि दुसरे के दुःख को देखकर उनका ह्रदय पिघल जाता है! वे दुसरे के हित को ही अपना हित समझते हैं! उन पुरुषों में विशुद्ध दया होती है ! जो दया कायरता, ममता, लज्जा, स्वार्थ और भय आदि के कारण कि जाती है, वह शुद्ध नहीं है ! जैसे भगवान की अहैतुकि दया समस्त जीवों पर है — इसी प्रकार महापुरुषों की अहैतुकी दया सब पर होती है! उनकी कोई कितनी ही बुराई क्यों न करे, बदला लेने की इच्छा तो उनके ह्रदय में होती ही नहीं ! कहीं बदला लेने की-सी क्रिया देखी जाती है, तो वह भी उसके दुर्गुणों को हटाकर उसे विशुद्ध करनेके लिये ही होती है ! इस क्रिया में भी उनकी दया छिपी रहती है — जैसे माता-पिता, गुरुजन बच्चे के सुधार के लिये स्नेहपूर्ण हृदय से उसे दण्ड देते हैं –इसी प्रकार संतों में भी कभी-कभी ऐसी क्रिया होती है, परन्तु इसमें भी परम हित भरा रहता है! वे संत करूणा के भण्डार होते हैं ! जो कोई उनके समीप जाता है, वह मानो दया के सागर में गोते लगता है ! उन पुरुषों के दर्शन, भाषण, स्पर्श और चिन्तन में भी मनुष्य उनके दया भाव को देखकर मुग्ध हो जाता है! वे जिस मार्ग से निकलते हैं, मेघ की-ज्यों दया की वर्षा करते हुए ही निकलते हैं !मेघ सब समय और सब जगह नहीं बरसता, परन्तु संत तो सदा – सर्वदा सर्वत्र बरसते ही रहते हैं!
इसलिये भी संतों का दर्जा भगवान से बढ़कर है! वे संत जगत के सारे जीवो में समता, शान्ति, प्रेम, ज्ञान और आनन्द का विस्तार कर सबको भगवान के सदृश बना देना चाहते हैं !

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गुरु बिन कौन उतारे पार ?

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चाहे प्रकृति में परिवर्तन हो जाय और सूर्य तपना छोड़दे, चन्द्रमा शीतलतारहित हो जाय, जल बहना त्याग दे, दिन की रात और रात का दिन क्यों न हो; एक बार हुई गुरुकृपा व्यर्थ नहीं जाती । यह कृपा शिष्य के साथ-साथ जन्म-जन्मांतरों में भी रहती है । इसीलिए आप धैर्य से, उत्साह से, प्रेम से अभ्यास करते रहें ।   – स्वामी मुक्तानंदजी

जो शिष्य गुरु के वचनों में दृ‹ढ भाव रखता है, वह स्वयं देवाधिदेव (सद्गुरु) बन जाता है ।

– समर्थ रामदासजी

जैसे एक नेत्र से दूसरा नेत्र कुछ भी दूर नहीं है तो भी बिना दर्पण के एक नेत्र दूसरे नेत्र को नहीं देख सकता, वैसे ही आत्मा और ब्रह्म में कुछ भी भेद नहीं है तो भी सद्गुरु-ज्ञान बिना आत्मा ब्रह्म को नहीं देख सकता । जब सद्गुरु अंतःकरणरूप हाथ में ज्ञान-दर्पण देते हैं, तब आत्मा ब्रह्म का साक्षात्कार करके उसीमें अभेद हो जाता है ।   – संत दादू दयालजी

आंतरिक मार्ग की रुकावटें और कठिनाइयाँ अति सूक्ष्म और जटिल हैं, इसलिए सिर्फ ऐसा कामिल मुर्शिद (सद्गुरु) ही इस राह पर जीव की रहनुमाई कर सकता है, जो खुद रास्ता तय करके मंजिल पर पहुँच चुका हो ।   – बाबा शेख फरीद

यदि गुरु-पिता न मिले तो जन्म होने पर भी नहीं होने के समान ही है क्योंकि गुरु द्वारा परमात्मा की प्राप्ति के लिए ही मनुष्य-जन्म है । गुरु प्राप्त न हुए तो नर-जन्म निष्फल है । – संत रज्जबजी

जैसे हाथी स्वप्न में शेर को देखनेमात्र से नींद से जाग जाता है, वैसे ही शिष्य गुरु की कृपादृष्टि से अज्ञानरूपी नींद से सत् ज्ञान में जाग जाता है ।               – श्री रमण महर्षि

गुरु के समान नहीं, दूसरा जहान में ।।

गुरु ब्रह्मरूप जानो, शिव का सरूप जानो ।

साक्षात् विष्णु जानो, लिखा वेद पुराण में ।।

यही सुरति१ वेद कहता, गुरु बिन ज्ञान कैसा ।

गुरु बिन आवे नहीं, सुरति तेरे ध्यान में ।।

छल कपट त्याग दीजौ, गुरुजी की सेवा कीजौ ।

गुरुजी के चरण लीजो, खुल खेलो मैदान में ।।

ज्ञान तो बतावे गुरु, पाप से बचावे गुरु ।

हरि से मिलावे गुरु, तुरियापद२ के ध्यान में ।।

निज नाम हृदय रख लो, भवqसधु से पार उतर लो ।

कहे रविदास पहुँच गये, बैठकर विमान में ।।

– संत रविदासजी

हमें गुरु की पूजा ईश्वर के रूप में करनी चाहिए, वे ईश्वर हैं । ईश्वर से जरा भी कम नहीं हैं । ज्यों-ज्यों आप उनको देखते जाते हैं, त्यों-त्यों धीरे-धीरे गुरु अदृश्य हो जाते हैं और ईश्वर ही बच जाते हैं, गुरु के चित्र के स्थान पर ईश्वर आ जाते हैं । ईश्वर ही हमारे पास आने के लिए गुरु का तेजोमय मोहरा पहनते हैं । ज्यों हम स्थिर दृष्टि से देखते हैं, त्यों मोहरा गिर जाता है और ईश्वर प्रकट हो जाते हैं ।   – स्वामी विवेकानंदजी

गुरु तो बहुत मिल सकते हैं लेकिन सद्गुरु इस धरती पर कभी-कभी, कहीं-कहीं मिल पाते हैं । सद्गुरुओं की महिमा अनेक ऋषि-मुनियों, संतों-महापुरुषों ने गायी है, गा रहे हैं और गाते ही रहेंगे फिर भी उनकी महिमा का कोई अंत नहीं, कोई पार नहीं ! ऐसे पवित्र महापुरुषों की अनुकम्पा व उनके पुण्य-प्रताप से ही पृथ्वी पावन होती रही है ।

जिसने एक बार भी सद्गुरु को पूर्ण संतुष्ट कर लिया, उसे फिर किसीको रिझाना बाकी नहीं रहता, कहीं जाना बाकी नहीं रहता, गुरु ऐसे तत्त्व में उसे जगा देते हैं ।   – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू