दृष्टि

विचार ही दिव्य दृष्टि है

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Sant Asaramji Bapu
Sant Asaramji Bapu

शास्त्रो का अनुगमन करनेवाली शुद्ध बुद्धि से अपने सम्बंध में सदा सर्वदा विचार करना चाहिये | विचार से तीक्ष्ण होकर बुद्धि परमात्मा का अनुभव करती है | इस संसार रुपी दीर्घ रोग का सबसे श्रेष्ठ औषध विचार ही है | विचार से विपतियो का मूल अज्ञान ही नष्ट हो जाता है| यह संसार मृत्यु, संकट और भ्रम से भरपूर है, इसपर विजय प्राप्त करने का उपाय एकमात्र विचार है| बुरे को छोड़कर, अच्छे को ग्रहण, पाप को छोड़ कर पुण्य का अनुष्ठान विचार के द्वारा ही होता है| विचार के द्वारा ही बल, बुद्धि, सामर्थ्य, स्फूर्ति और प्रयत्न सफल होते है| राज्य, सम्पति और मोक्ष भी विचार से प्राप्त होता है | विचारवान पुरुष विपत्ति में घबराते नहीं,सम्पति में फूल नहीं उठाते | विचारहीन के लिये सम्पति भी विपत्ति बन जाती है | संसार के सारे दुःख अविवेक के कारण है | विवेक धधकती हुई अंतर्ज्वाला को भी शीतल बना देता है | विचार ही दिव्य दृष्टि है, इसी से परमात्मा का साक्षात्कार और परमानन्द की अनुभूति होती है | यह संसार क्या है? मैं कौन हूँ? इससे मेरा क्या सम्बन्ध है? यह विचार करते ही संसार से सम्बन्ध छुटकर परमात्मा का साक्षात्कार होने लगता है | इसलिये शास्त्रानुगामिनी शान्त, शुद्ध, बुधि, से विचार करते रहना चाहिए |

मंगलमय दृष्टि रखें

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मंगलमय दृष्टि

अपनी दृष्टि को शुभ बनायें । कहीं भी बुराई न देखें । सर्वत्र मंगलमय दृष्टि रखे बिना मन में शांति नहीं रहेगी । जगत आपके लिए कल्याणकारी ही है । सुख-दुःख के सभी प्रसंग आपकी गढ़ाई करने के लिए हैं । सभी शुभ और पवित्र हैं । संसार की कोई बुराई आपके लिए नहीं है । सृष्टि को मंगलमय दृष्टि से देखेंगे तो आपकी जय होगी ।
दृष्टिं ब्रह्ममयीं कृत्वा पश्यमेवमिदं जगत ।