गौ-रक्षा मनुष्यमात्र का धर्म

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gau raksha

शास्त्रों में तो गाय को मोक्ष और भगवद्प्राप्ति का दाता कहा गया है। गाय का घृत सर्वोत्तम हवि है, इससे यज्ञ सम्पन्न होता है। यज्ञ से बादल बनते और वृष्टि होती है जिससे तृणादिक अन्न पैदा होता है और मानव-जीवन की सुख-सुविधायें बढ़ती हैं। यज्ञ परमार्थ का पर्यायवाची है, तात्पर्य यह है कि उससे पुण्य बढ़ता है, धन और भोग उपलब्ध होते हैं। इस तरह मनुष्य लौकिक एवं पारलौकिक व प्रेय और श्रेय दोनों साधनाओं को सम्पन्न कर मुक्ति का अधिकारी बनता है। यदि इन बातों को अगम्य बुद्धि मानें तो भी इतना तो है ही कि गाय की उपयोगिता सर्वोच्च है कृषि का सम्पूर्ण भार उसी की पीठ पर है। एक ओर बछड़े देकर और दूसरी ओर स्वास्थ्य का साधन प्रस्तुत कर वह किसान का और इस तरह समाज और राष्ट्र का बड़ा कल्याण करती है।

गाय के दूध की शक्ति , उष्णता, सात्विकता और तेजस्विता के सम्बन्ध में भारतीय तत्ववेत्ता महापुरुष, वैज्ञानिक और संसार के तमाम धर्म एकमत हैं। कहीं कोई विवाद या प्रतिवाद नहीं। सभी ने गाय के दूध को अमृत-तुल्य और परम पोषक पदार्थ माना है। यथा—

यूयं गावो मेदयथा कृशं चिद्श्रींर चित् कृणुथा सुप्रतीकम। भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो वृहद्वो वय उच्यते सभासु।

(अथर्व. 4। 21। 6)

अर्थ—हे गौ माता! तुम्हारा अमृततुल्य दूध दुर्बल व्यक्तियों को बलवान बनाता है, कुरूप को सुन्दर और सुडौल बनाता है। तुम हमारे घरों को मंगलमय रखती हो। हम विद्वानों की सभा में तुम्हारा यशगान करते हैं।

गोक्षीर मनभिष्यन्दि स्निग्धं गुरु रसायनम्। रक्त पित्त हरं शीतं मधुरं रसपाकयोः। जीवनयं तथा वातपित्तघ्नं परमं स्मृतम्॥

—सुश्रुत

अर्थात् गाय का दूध शौच साफ करने वाला, चिकना व शक्तिवर्द्धक और रसायन है। गाय का दूध रक्त तथा पित्त का शमन करता है। शीतल, स्वादिष्ट, आयुबर्द्धक और वात-पित्तहारी सर्व गुणकारी तथा मधुर फल देने वाला है।

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