मेरे जीवन का अनुभव

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jivan anubhav
Sant Shri Asharamji Bapu

जीव और परमात्मा के बीच केवल अहं की कड़ी दीवार ही खड़ी है। दोनों के बीच और कोई दूरी नहीं है। जब अहंकार खड़ा होता है तो परमात्मा छिप जाता है। अहंकार खो जाता है तो जीव परमात्मा हो जाता है। एक बूढ़े संत महात्मा से किसी गृहस्थी ने पूछाः “बाबाजी ! आपके जीवन का साररूप अनुभव क्या है ?” बाबाजी ने कहाः “देख ले, यह मेरे सारे जीवन का साररूप अनुभव है….” कहकर उन्होंने अपना मुँह खोला। दाँत नहीं थे। जिह्वा घुमाकर बताया किः “यही हमारे जीवन का अनुभव है।” “बाबाजी ! हम कुछ समझे नहीं, कृपा करके बताइये।” गृहस्थ ने प्रार्थना की। बाबाजी बोलेः “देखो, दाँत कड़े थे तो गायब हो गये जिह्वा नरम है इसलिए मौजूद है। जो कड़ा होता है वह जाता है। यही मेरे जीवन का अनुभव है।” जिसमें कड़ापन है, अकड़ है वह जल्दी मरता है। देह को ‘मेरा’ मानकर जो अकड़ा है और बुद्धि के द्वारा जो कुछ जगत का कचरा भरा है, उस विद्या को मेरी विद्या मानकर जो अकड़ा है वह जल्दी टूट जाता है। जिसको इन सांसारिक चीजों की अकड़ नहीं है, जो अस्तित्व पर बिखरता है उसकी भक्ति, उसकी श्रद्धा, उसकी ईश्वर-प्रीति कायम रहती है।

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