गुरु बिन कौन उतारे पार ?

Posted on Updated on

hami-se-hai-jamana-40

चाहे प्रकृति में परिवर्तन हो जाय और सूर्य तपना छोड़दे, चन्द्रमा शीतलतारहित हो जाय, जल बहना त्याग दे, दिन की रात और रात का दिन क्यों न हो; एक बार हुई गुरुकृपा व्यर्थ नहीं जाती । यह कृपा शिष्य के साथ-साथ जन्म-जन्मांतरों में भी रहती है । इसीलिए आप धैर्य से, उत्साह से, प्रेम से अभ्यास करते रहें ।   – स्वामी मुक्तानंदजी

जो शिष्य गुरु के वचनों में दृ‹ढ भाव रखता है, वह स्वयं देवाधिदेव (सद्गुरु) बन जाता है ।

– समर्थ रामदासजी

जैसे एक नेत्र से दूसरा नेत्र कुछ भी दूर नहीं है तो भी बिना दर्पण के एक नेत्र दूसरे नेत्र को नहीं देख सकता, वैसे ही आत्मा और ब्रह्म में कुछ भी भेद नहीं है तो भी सद्गुरु-ज्ञान बिना आत्मा ब्रह्म को नहीं देख सकता । जब सद्गुरु अंतःकरणरूप हाथ में ज्ञान-दर्पण देते हैं, तब आत्मा ब्रह्म का साक्षात्कार करके उसीमें अभेद हो जाता है ।   – संत दादू दयालजी

आंतरिक मार्ग की रुकावटें और कठिनाइयाँ अति सूक्ष्म और जटिल हैं, इसलिए सिर्फ ऐसा कामिल मुर्शिद (सद्गुरु) ही इस राह पर जीव की रहनुमाई कर सकता है, जो खुद रास्ता तय करके मंजिल पर पहुँच चुका हो ।   – बाबा शेख फरीद

यदि गुरु-पिता न मिले तो जन्म होने पर भी नहीं होने के समान ही है क्योंकि गुरु द्वारा परमात्मा की प्राप्ति के लिए ही मनुष्य-जन्म है । गुरु प्राप्त न हुए तो नर-जन्म निष्फल है । – संत रज्जबजी

जैसे हाथी स्वप्न में शेर को देखनेमात्र से नींद से जाग जाता है, वैसे ही शिष्य गुरु की कृपादृष्टि से अज्ञानरूपी नींद से सत् ज्ञान में जाग जाता है ।               – श्री रमण महर्षि

गुरु के समान नहीं, दूसरा जहान में ।।

गुरु ब्रह्मरूप जानो, शिव का सरूप जानो ।

साक्षात् विष्णु जानो, लिखा वेद पुराण में ।।

यही सुरति१ वेद कहता, गुरु बिन ज्ञान कैसा ।

गुरु बिन आवे नहीं, सुरति तेरे ध्यान में ।।

छल कपट त्याग दीजौ, गुरुजी की सेवा कीजौ ।

गुरुजी के चरण लीजो, खुल खेलो मैदान में ।।

ज्ञान तो बतावे गुरु, पाप से बचावे गुरु ।

हरि से मिलावे गुरु, तुरियापद२ के ध्यान में ।।

निज नाम हृदय रख लो, भवqसधु से पार उतर लो ।

कहे रविदास पहुँच गये, बैठकर विमान में ।।

– संत रविदासजी

हमें गुरु की पूजा ईश्वर के रूप में करनी चाहिए, वे ईश्वर हैं । ईश्वर से जरा भी कम नहीं हैं । ज्यों-ज्यों आप उनको देखते जाते हैं, त्यों-त्यों धीरे-धीरे गुरु अदृश्य हो जाते हैं और ईश्वर ही बच जाते हैं, गुरु के चित्र के स्थान पर ईश्वर आ जाते हैं । ईश्वर ही हमारे पास आने के लिए गुरु का तेजोमय मोहरा पहनते हैं । ज्यों हम स्थिर दृष्टि से देखते हैं, त्यों मोहरा गिर जाता है और ईश्वर प्रकट हो जाते हैं ।   – स्वामी विवेकानंदजी

गुरु तो बहुत मिल सकते हैं लेकिन सद्गुरु इस धरती पर कभी-कभी, कहीं-कहीं मिल पाते हैं । सद्गुरुओं की महिमा अनेक ऋषि-मुनियों, संतों-महापुरुषों ने गायी है, गा रहे हैं और गाते ही रहेंगे फिर भी उनकी महिमा का कोई अंत नहीं, कोई पार नहीं ! ऐसे पवित्र महापुरुषों की अनुकम्पा व उनके पुण्य-प्रताप से ही पृथ्वी पावन होती रही है ।

जिसने एक बार भी सद्गुरु को पूर्ण संतुष्ट कर लिया, उसे फिर किसीको रिझाना बाकी नहीं रहता, कहीं जाना बाकी नहीं रहता, गुरु ऐसे तत्त्व में उसे जगा देते हैं ।   – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s