आनंद उत्सव

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Anand Utsav

आनंद कुछ और नहीं, एक दिव्य मस्ती है, जिसमें साधक हर पल सराबोर रहता है। यह मस्ती हमेशा एक जैसी रहती है, कम-ज्यादा नहीं होती। यह आनंद हमारी चेतना से उपजने वाली एक दिव्य सुगंध है, जो हर पल महकती रहती है, लेकिन माया में उलझे रहने के कारण इस मस्ती का अनुभव नहीं हो पाता। अगर आनंद को पाना है तो आत्म भाव में आना होगा क्योंकि आनंद तो आत्मा में ही होता है। आनंद नदी के बहाव की तरह है जो मन, बुद्धि और ह्रदय में खुशी का संचार कर देता है। यह आंतरिक खुशी है, इसका संबंध भौतिक पदार्थों से नहीं होता। कहने को तो हम कह देते हैं कि आज खाना खाकर आनंद आ गया। असलियत में यह आनंद नहीं बल्कि क्षणिक सुख होता है जो इंद्रियों के स्तर पर महसूस किया जाता है।

ब्रह्मानंद, चिदानंद, दिव्यानंद, सच्चिदानंद शब्दों से हम आनंद शब्द का मतलब समझ सकते है। जैसे सच्चिदानंद में तीन शब्द हैं। सत, चिद और आनंद। सत, जो हमेशा एक जैसा रहे, किसी भी काल का उस पर असर न हो, जो सर्वव्यापी हो, जन्म और मृत्यु से परे हो। ऐसा तो केवल चिद ही है। चिद का अर्थ होता है आत्मा या चैतन्य, जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। इसलिए मन को जब सतरूपी चिद में लगाएंगे तो आनंद की प्राप्ति होगी।

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