Month: May 2015

निर्जला एकादशी

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Nirjala Ekadashi
निर्जला एकादशी

 

युधिष्ठिर ने कहा : जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं ।

तब वेदव्यासजी कहने लगे : दोनों ही पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन न करे । द्वादशी के दिन स्नान आदि से पवित्र हो फूलों से भगवान केशव की पूजा करे । फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे । राजन् ! जननाशौच और मरणाशौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए ।

यह सुनकर भीमसेन बोले : परम बुद्धिमान पितामह ! मेरी उत्तम बात सुनिये । राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि : ‘भीमसेन ! तुम भी एकादशी को न खाया करो…’ किन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी ।

भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा : यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशीयों के दिन भोजन न करना ।

भीमसेन बोले : महाबुद्धिमान पितामह ! मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूँ । एक बार भोजन करके भी मुझसे व्रत नहीं किया जा सकता, फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूँ? मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है । इसलिए महामुने ! मैं वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ । जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये । मैं उसका यथोचित रुप से पालन करुँगा ।

व्यासजी ने कहा : भीम ! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो । केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है । एकादशी को सूर्यौदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्यौदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है । तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे । इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे । वर्षभर में जितनी एकादशीयाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि: ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है ।’

एकादशी व्रत करनेवाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते । अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाववाले, हाथ में सुदर्शन धारण करनेवाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आखिर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं । अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो । स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है । जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है । उसे एक एक प्रहर में कोटि कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है । मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है । निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है । जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है । इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है ।

जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे । जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं ।

कुन्तीनन्दन ! ‘निर्जला एकादशी’ के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करनेवाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है । पर्याप्त दक्षिणा और भाँति भाँति के मिष्ठान्नों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए । ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं । जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आनेवाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है । निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए । जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है । जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है । चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है । पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि : ‘मैं भगवान केशव की प्रसन्न्ता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा ।’ द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए । गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे :

देवदेव ह्रषीकेश संसारार्णवतारक ।
उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥

‘संसारसागर से तारनेवाले हे देवदेव ह्रषीकेश ! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये ।’

भीमसेन ! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए । उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए । ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है । तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे । जो इस प्रकार पूर्ण रुप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है ।

यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया । तबसे यह लोक मे ‘पाण्डव द्वादशी’ के नाम से विख्यात हुई ।

परमात्मा से मुलाकात की कुँजी

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Sant Shri Asaramji Bapu
Sant Shri Asaramji Bapu

जीवात्मा को 84 लाख जन्मों से छुट्टी करके परमात्मा से मुलाकात करा देने की कुँजी का नाम दीक्षा है।

सदगुरू मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट।
मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।

मनुष्य सचमुच में महान से भी महान हो सकता है क्योंकि उसका वास्तविक संबंध महान से महान अकाल पुरूष से जुड़ा है। जैसे कोई भी तरंग सड़क पर नहीं दौड़ती, पानी पर ही तरंग दौड़ती है, ऐसे ही तुम्हारा मन चैतन्य अकाल पुरूष की सत्ता से ही दौड़ता है और विचार करता है, इतने निकटस्थ हो तुम परमात्मा के।
जो आद् सत् है, युगों-युगों से सत् है, अब भी सत् है और बाद में भी सत् रहेगा। उस सत्यस्वरूप का ज्ञान देने वाले सदगुरू मिल जाएँ….. उनसे प्रेम हो जाये…. बस।

हरि बोल हरि बोल..

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hari  bol  hari bol
चैत्यन्य महाप्रभु गौरांग भक्तों के साथ कीर्तन करते करते नदी किनारे जा निकले..नदी किनारे एक धोबी हुश हुश करते हुए
कपडे धो रहा था…गौरांग को क्या सूझी कि धोबी को बोले हुश हुश क्या करता है?..हरि बोल हरि बोल…
धोबी बोला, बाबा तुम्हारे साथ मैं नाचूँगा तो मेरे कपडे कौन धोएगा?..रोजी रोटी कौन करेगा ?
आप तो बाबा लोगों का ठीक है हरि बोल हरि बोल…मैं हरि बोल करूंगा तो मेरा धंधा कौन करेगा..
गौरांग बोले, तेरा धंधा तो मैं कर लूं .तू हरि बोल..लाओ कपड़ा…
गौरांग महा प्रभु कपड़ा धोते–हुश करते ..और धोबी बोलता हरि बोल..हुश!–हरिबोल..हुश!–हरि बोल…हुश!—-हरि बोल..
हुश हुश करते करते धोबी के सारे पाप हुश हो गए…धोबी को तो हरि बोल का रंग लग गया!..
बोला अब तो बाबा आप के साथ ही रहूंगा हरि बोल हरि बोल करूंगा मैं तो..हरि बोल.. हरि बोल…
गाँव में खबर फैली कि धोबी तो बावरा हो गया..बाबा लोगों के साथ हरि बोल हरि बोलकर रहा..
धोबी की पत्नी भी आ गयी..
बोली..ऐ रसूल के अब्बा..
धोबी बोले ‘हरि बोल!’
धोबी की पत्नी बोली.. ‘ऐ जुनेद के अब्बा ……’
धोबी बोले ‘हरि बोल!’
पत्नी बोली, ‘ये क्या करते हो?’..धोबी ने ज़रा हाथ लगाया तो पत्नी भी बोल पड़ी : हरिबोल!हरि बोल!हरि बोल!…
गाँव के लोग बोले बाई वो तो दीवाना हो गया तुम क्यों ऐसा करती हो..दूसरी बाई ने धोबी की पत्नी के हाथ पकड़ के समझाया..
तो वो बाई भी लग गयी हरि बोल हरि बोल करने….तीसरे भाई ने रोका तो वो भी हरि बोल हरि बोल करने लग गया..
गाँव के जो भी उन को रोकने आते वो हरि बोल हरि बोल के कीर्तन में रंग जाते..जैसे संक्रामक रोग छूने वाले को लग जाता
ऐसे इस हितकारी और पवित्र भगवान के नाम की मस्ती ने गाँव वालों को झूमा झूमा कर ऐसे पवित्र कर दिया कि इतिहास
बोलता है कि वो धोबी धन्य रहा होगा जिसने संत के दर्शन से हरि बोल करते हुए सारे गाँव को पवित्र करदिया!

हरि किस को बोलते पता है? जो हर जगह, हर देश में, हर काल में, हर वस्तु में , हर परिस्थिति में जो परमेश्वर मौजूद है
उसी का नाम हरि है…और उस का स्मरण करने से पाप ताप शोक दुःख हर लिए जाते है..कैसा भी बीमार आदमी हो,
उस को हरि ॐ की साधना दे दो..चंगा होने लगेगा! बिलकुल पक्की बात है..

गौ-रक्षा मनुष्यमात्र का धर्म

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gau raksha

शास्त्रों में तो गाय को मोक्ष और भगवद्प्राप्ति का दाता कहा गया है। गाय का घृत सर्वोत्तम हवि है, इससे यज्ञ सम्पन्न होता है। यज्ञ से बादल बनते और वृष्टि होती है जिससे तृणादिक अन्न पैदा होता है और मानव-जीवन की सुख-सुविधायें बढ़ती हैं। यज्ञ परमार्थ का पर्यायवाची है, तात्पर्य यह है कि उससे पुण्य बढ़ता है, धन और भोग उपलब्ध होते हैं। इस तरह मनुष्य लौकिक एवं पारलौकिक व प्रेय और श्रेय दोनों साधनाओं को सम्पन्न कर मुक्ति का अधिकारी बनता है। यदि इन बातों को अगम्य बुद्धि मानें तो भी इतना तो है ही कि गाय की उपयोगिता सर्वोच्च है कृषि का सम्पूर्ण भार उसी की पीठ पर है। एक ओर बछड़े देकर और दूसरी ओर स्वास्थ्य का साधन प्रस्तुत कर वह किसान का और इस तरह समाज और राष्ट्र का बड़ा कल्याण करती है।

गाय के दूध की शक्ति , उष्णता, सात्विकता और तेजस्विता के सम्बन्ध में भारतीय तत्ववेत्ता महापुरुष, वैज्ञानिक और संसार के तमाम धर्म एकमत हैं। कहीं कोई विवाद या प्रतिवाद नहीं। सभी ने गाय के दूध को अमृत-तुल्य और परम पोषक पदार्थ माना है। यथा—

यूयं गावो मेदयथा कृशं चिद्श्रींर चित् कृणुथा सुप्रतीकम। भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो वृहद्वो वय उच्यते सभासु।

(अथर्व. 4। 21। 6)

अर्थ—हे गौ माता! तुम्हारा अमृततुल्य दूध दुर्बल व्यक्तियों को बलवान बनाता है, कुरूप को सुन्दर और सुडौल बनाता है। तुम हमारे घरों को मंगलमय रखती हो। हम विद्वानों की सभा में तुम्हारा यशगान करते हैं।

गोक्षीर मनभिष्यन्दि स्निग्धं गुरु रसायनम्। रक्त पित्त हरं शीतं मधुरं रसपाकयोः। जीवनयं तथा वातपित्तघ्नं परमं स्मृतम्॥

—सुश्रुत

अर्थात् गाय का दूध शौच साफ करने वाला, चिकना व शक्तिवर्द्धक और रसायन है। गाय का दूध रक्त तथा पित्त का शमन करता है। शीतल, स्वादिष्ट, आयुबर्द्धक और वात-पित्तहारी सर्व गुणकारी तथा मधुर फल देने वाला है।

प्रार्थना में अथाह शक्ति

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Sant Asaramji Bapu Prarthana

एक पेड़ पर पपिहा रहता था .और उस जंगल मैं एक शिकारी भी था एक दिन उस शिकारी की नज़र उस पपिहे पर गयी . उसने शिकार करने की सोची और तीर उठाया . पपिहा यह देखकर घबरा गया और उसने उपर देखा तो बाज़ उस पपिहे की ओर आ रहा था . ऐसे मैं पपिहा दोनो ओर से घिर गया . और आर्त भाव से प्रभु से प्रार्थना की !! हे प्रभु अब तूहि है जो मेरे प्राण बचा सकता है हे हरि !! हे हरि !!! पूज्य श्रीके वचन :- जब आप हरि की शरणआगति जाते है तो सर्व समर्थ परमात्मा आता है और अपने भक्त को बचाता है तो हुआ ये
जहा शिकारी खड़ा हुआ था उस पेड़ के नीचे से सांप निकल कर शिकारी को काट गया और उसका निशाना पपिहे के बजाय बाज़ मे जाकर लगा और पपिहे के प्राण बच गये तो इससे यह तातपर्य है की जब भी आप बुरी समस्या मे हो तो हरि की शरण लो ना की जगत की |

खतरनाक है कोल्ड ड्रिंक

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cold drinks

शीतल पेय (सॉफ्टड्रिंक्स) में पेस्टीसाइडस और एसिड अत्यधिक नुकसानकारक मात्रा में मौजूद हैं। डीडीटी से कैंसर, रोगप्रतिकारक शक्ति का ह्रास और जातीय विकास में विकृति होती है। लींडेन से कैंसर होता है तथा मस्तिष्क और चेता तंत्र (नर्वस सिस्टम) को हानि होती है। मेलेथियोन ज्ञानतंतुओं की हानि करता है और भावी पीढ़ियों को आनुवंशिक विकृतियों का शिकार बनाता है। इनमें कार्बोलिक एसिड होने की वजह से ये खतरनाक हैं, जिनका सेवन नहीं किया जा सकता है। ʹसेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरोनमेंटʹ की निदेशक तथा प्रख्यात पर्यावरणविद् सुनीत नारायण ने बाजार में मौजूद तमाम कम्पनियों के सॉफ्टड्रिंक्स के नमूनों की जाँच करवायी और सारे नमूनों में खतरनाक मात्रा में पेस्टीसाइडस पाये गये, जो उपयोगकर्ता के स्वास्थ्य को गम्भीर नुकसान पहुँचाते हैं। महाराष्ट्र के ʹफूड एंड ड्रग्सʹ विभाग ने अपनी जाँच में पाया था कि ये पेय छात्रों के स्वास्थ्य का सत्यानाश कर रहे हैं।

चित्त की मधुरता

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madhurata
Sant Asaramji Bapu

चित्त की मधुरता से, बुद्धि की स्थिरता से सारे दुःख दूर हो जाते हैं। चित्त की प्रसन्नता से दुःख तो दूर होते ही हैं लेकिन भगवद-भक्ति और भगवान में भी मन लगता है। इसीलिए कपड़ा बिगड़ जाये तो ज्यादा चिन्ता नहीं, दाल बिगड़ जाये तो बहुत फिकर नहीं, रूपया बिगड़ जाये तो ज्यादा फिकर नहीं लेकिन अपना दिल मत बिगड़ने देना। क्योंकि इस दिल में दिलबर परमात्मा स्वयं विराजते हैं। चाहे फिर तुम अपने आपको महावीर के भक्त मानो चाहे श्रीकृष्ण के भक्त मानो चाहे मोहम्मद के मानो चाहे किसी के भी मानो, लेकिन जो मान्यता उठेगी वह मन से उठेगी और मन को सत्ता देने वाली जो चेतना है वह सबके अन्दर एक जैसी है।