“सत्य तो सत्य है ” श्री रमण महर्षि पुण्यतिथि १४ अप्रैल

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(श्री रमण महर्षि पुण्यतिथि : १४ अप्रैल)
एक बार रमण महर्षि को कुछ लोग खूब रिझा-रिझाकर अपने गाँव में ले गये । रमण महर्षि जैसे ब्रह्मवेत्ता साक्षात्कारी महापुरुष आ रहे हैं, यह जानकर गाँववालों ने अपनी एडी-चोटी का जोर लगाकर उनके स्वागत की तैयारियाँ कीं । बडा विशाल मंच तैयार किया गया ।
लोग उनके दर्शन पाकर कृतार्थ हो गये । रमण महर्षि बहुत कम बोलते थे । उन्होंने थोडे-से ही शब्द कहे तो तालियों की गडग डाहट से गगनमंडल गूँज उठा । यह देखकर वे तुरंत मंच से उतर पडे और खूब रोये । स्व. प्रधानमंत्री श्री मोरारजीभाई देसाई जिनके श्रीचरणों में जाकर बैठते थे, ऐसे उच्च कोटि के संत यदि रोने लग जायें तो लोगों को आश्चर्य होना स्वाभाविक है । लोगों ने पूछा : ‘‘भगवन् ! क्या बात है ? आप क्यों रो पडे ?
रमण महर्षि : ‘‘गलती हो गयी ।
लोग : ‘‘गलती ! कैसी गलती ?
रमण महर्षि : ‘‘तुम लोगों ने इतनी सारी तालियाँ बजार्इं । जरूर मेरे से कोई गलती हो गयी
लोग : ‘‘नहीं नहीं, आप इतना अच्छा बोले, इसीलिए हम लोगों ने तालियाँ बजार्इं ।
रमण महर्षि : ‘‘तुम लोग जीते हो मिथ्या में । मिथ्या में जीनेवाले लोगों को कोई बात अच्छी लगी है तो इसका मतलब यह है कि मैं सत्य से नीचे आया हूँ । मिथ्यावालों की लाइन में आया हूँ, तभी तुम्हें बात अच्छी लगी है । हे परमात्मा ! मुझे क्षमा करना ।
लोकानुरंजन परमार्थ नहीं है । बहुत लोग किसीको मानते हैं एवं उनका आदर करते हैं, इसलिए वे महात्मा हैं- ऐसी बात नहीं है । सद्गुरु या सत्य का साक्षात्कार किये हुए महापुुरुष आपको जितना जान सकते हैं, उतना और सब मिलकर भी नहीं जान सकते । जैसे, दसवीं कक्षा के लाखों विद्यार्थी उतना नहीं जान सकते, जितना प्रोफेसर जान सकता है । यही बात सद्गुरु एवं शिष्य के विषय में समझनी चाहिए ।
लोगों की वाहवाही से सत्य की कसौटी नहीं होती । धन-वैभव से भी सत्य को नहीं मापा जा सकता और न ही सत्ता द्वारा सत्य को मापना संभव है । सत्य तो सत्य है । उसे किसी भी असत्य वस्तु से मापा नहीं जा सकता ।
माँ आनंदमयी के पास इन्दिरा गाँधी जाती थीं, इसलिए माँ आनंदमयी बडी हैं-ऐसी बात नहीं है । वे तो हैं ही बडी, बल्कि यह इन्दिरा गाँधी का सौभाग्य था कि ऐसी महान् विभूति के पास वे जाती थीं । रमण महर्षि के पास मोरारजीभाई जाते थे तो इससे रमण महर्षि बडे थे, ऐसी बात नहीं है वरन् मोरारजीभाई का सौभाग्य था कि उनके श्रीचरणों में बैठकर वे अपना भाग्य बनाते थे ।
लोग यदि ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों को जानते-मानते हैं तो यह लोगों का सौभाग्य है । कई ऐसे लोग हैं जिन्हें लाखों लोग जानते हैं, फिर भी वे ऊँची स्थिति में नहीं होते । कई ऐसे महापुरुष होते हैं जिन्हें उनके जीवनकाल में लोग उतना नहीं जानते जितना उनके देहावसान के बाद जानते हैं । भारत में तो ऐसे कई महापुरुष हैं जिन्हें कोई नहीं जानता, जबकि वे बडा ऊँचा जीवन जीकर चले जाते हैं ।
जैसे प्रधानमंत्री आदिवासियों के बीच आकर उन्हीं के जैसी वेशभूषा में रहें तो उनकी योग्यता को आदिवासी क्या जान पायेंगे ? वे तो उनके शरीर को ही देख पायेंगे । उनकी एक कलम से इन्कमटैक्स के कितने ही नियम बदल जाते हैं, कितने ही सेठों की नींद हराम हो जाती है । इस बात का ज्ञान आदिवासियों को नहीं हो पायेगा । ऐसे ही ज्ञानी महापुुरुष भी स्थूल रूप से तो और लोगों जैसे ही लगते हैं, खाते-पीते, लेते-देते दिखते हैं किन्तु उनकी सूक्ष्म सत्ता का बयान कर पाना संभव ही नहीं है । किसीने ठीक ही कहा है :
पारस अरु संत में बडा अंतरहू जान । एक करे लोहे को कंचन ज्ञानी आप समान ।।
पारस लोहे को स्वर्ण तो बना सकता है किन्तु उसे पारस नहीं बना सकता, जबकि ज्ञानी पुरुष व्यक्ति को अपने ही समान ज्ञानी बना सकता है ।
ईश्वर दर्शन देने के लिए तैयार हैं, गुरु समर्थ हैं तो फिर हम देर क्यों करें ? यदि दर्शन करते-करते मर भी गये तो मरना सफल हो जायेगा एवं दर्शन के बाद जिये तो जीना भी सफल हो जायेगा ।
ऐसे ही प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध ब्रह्मज्ञानी संतों का दर्शन व सत्संग करते-करते मर भी गये तो अमर पद के द्वार खुल जाएँगे और जीते रहे तो भी समय पाकर जीवन्मुक्त हो जाएँगे ।
(ऋषि प्रसाद : दिसम्बर १९९८)
* लोगों की वाहवाही से सत्य की कसौटी नहीं होती । धन-वैभव से भी सत्य को नहीं मापा जा सकता और न ही सत्ता द्वारा सत्य को मापना संभव है । सत्य तो सत्य है । उसे किसी भी असत्य वस्तु से मापा नहीं जा सकता ।

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