Month: April 2015

हो गई रहेमत तेरी

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ho gai rahmat teri sadguru rahmat

हो गई रहेमत तेरी
हो गई रहेमत तेरी सदगुरु रहेमत छा गई।
देखते ही देखते आँखों में मस्ती आ गई।।
गम मेरे सब मिट गये और मिट गये रंजो अलम।
जब से देखी है तेरी दीदार ए मेरे सनम।।
हो गई….
आँख तेरी ने पिलाई है मुझे ऐसी शराब।
बेखुदी से मस्त हूँ उठ गये सारे हजाब।।
हो गई…
मस्त करती जा रही शक्ल नूरानी तेरी।
कुछ पता-सा दे रही आँख मस्तानी तेरी।।
हो गई…
अब तो जीऊँगा मैं दुनियाँ में तेरा ही नाम लें।
आ जरा नैनों के सदके मुझको सदगुरु थाम ले।।
हो गई….

जब तक जीना तब तक सीना…..

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bapu ji
 

कई लोग भगवान के रास्ते चलते हैं। गलती यह करते हैं कि ‘चलो, सबमें भगवान हैं।’ ऐसा करके अपने व्यवहार का विस्तार करते रहते हैं। तत्त्वज्ञान के रास्ते चलने वाले साधक सोचते हैं कि सब माया में हो रहा है। ऐसा करके साधन-भजन में शिथिलता करते हैं और व्यवहार बढ़ाये चले जाते हैं।

अरे, माया में हो रहा है लेकिन माया से पार होने की अवस्था में भी तो जाओ साधन भजन करके ! साधन भजन छोड़ क्यों रहे हो ? ‘जब तक जीना तब तक सीना।’ जब तक जीवन है तब तक साधन-भजन की गुदड़ी को सीते रहो।
थोड़ा वेदान्त इधर-उधर सुन लिया। आ गये निर्णय पर ‘सब प्रकृति में हो रहा है।’ फिर दे धमाधम व्यवहार में। साधन भजन की फुरसत ही नहीं।

जो साधन-भजन छोड़ देते हैं वे शाब्दिक ज्ञानी बनकर रह जाते हैं। ‘मैं भगवान का हूँ’ यह मान लेते हैं और संसार की गाड़ी खींचने में लगे रहते हैं। अपने को भगवान का मान लेना अच्छा है। साधन-भजन का त्याग करना अच्छा नहीं। भगवान स्वयं प्रातःकाल में समाधिस्थ रहते हैं। शिवजी स्वयं समाधि करते हैं। रामजी स्वयं गुरू के द्वार पर जाते हैं, आप्तकाम पुरूषों का संग करते हैं। श्रीकृष्ण दुर्वासा ऋषि को गाड़ी में बिठाकर, घोड़ों को हटाकर स्वयं गाड़ी खींचते हैं। उनको ऐसा करने की क्या जरूरत थी ?

हम लोगों को थोड़े रूपये-पैसे, कुछ सुख-सुविधाएँ मिल जाती हैं तो बोलते हैं- ‘अब भगवान की दया है। जब मर जायेंगे तब भगवान हमें पकड़कर स्वर्ग में ले जायेंगे।’

अरे भाई ! तू अपनी साधना की गुदड़ी सीना चालू तो रख ! बन्द क्यों करता है ? साधन-भजन छोड़कर बैठेगा तो संसार और धन्धा-रोजगार के संस्कार चित्त में घुस जायेंगे। ‘जब तक जीना तब तक सीना।’ जीवन का मंत्र बना लो इसे।
चार पैसे की खेतीवाला सारी जिन्दगी काम चालू रखता है, चार पैसे की दुकानवाला सारी जिन्दगी काम चालू रखता है, चार पैसे का व्यवहार सम्भालने के लिए आदमी सदा लगा ही रहता है। मर जाने वाले शरीर को भी कभी छुट्टी की ? श्वास लेने से कभी छुट्टी ली ? पानी पीने से छुट्टी की ? भोजन करने से छुट्टी की ? नहीं। तो भजन से छुट्टी क्यों ?

‘जब तक जीना तब तक सीना…. जब तक जीना तब तक सीना।’ यह मंत्र होना चाहिए जीवन का।

हम जो चाहते है वह सब हो यह सम्भव नहीं है

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bapuji11

यह जरूरी नहीं कि हम जैसा चाहते हैं ऐसा जगत बन जाएगा। यह सम्भव नहीं है। हम चाहेंगे ऐसी पत्नी होगी यह सम्भव नहीं है। पति ऐसा ही होगा यह सम्भव नहीं है। शिष्य ऐसा ही होगा यह सम्भव नहीं है। हम जैसा चाहें ऐसे गुरू बनें यह सम्भव नहीं है। यह सम्भव नहीं है ऐसा समझते हुए भी जितना भी उनका कल्याण हो सके ऐसी उनको यात्रा कराना यह अपने हृदय को भी खुश रखना है और उनका भी कल्याण करना है। हृदय को भी खुश रखना है और उनका भी कल्याण करना है।अगर हम किसी प्रकार की पकड़ बाँध रखें तो हमें दुःख होगा।

तुलसी लगाने से मिलती है समृद्धि

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tulsi mahima

भारतीय धर्म एवं संस्कृति में बहुत से पेड़-पौधों को पूजनीय मानते हुए उन्हें लगाकर उनका संरक्षण करना अनिवार्य बताया गया है। इनमें तुलसी, पीपल, आंवला, बरगद, अशोक, आम, बेल, आदि प्रमुख हैं। यद्यपि इन पौधों का सीधा संबंध हमारे पर्यावरण के संरक्षण से है फिर भी अनेक धार्मिक और मांगलिक कार्यों में इनका उपयोग किया जाता है। तुलसी एकमात्र ऐसा पौधा है जो आसानी से कहीं भी लगाया जा सकता है। इसके लिए ज्यादा जगह की भी आवश्यकता नहीं होती है। भगवान विष्णु को तुलसी बहुत प्रिय हैं। प्रसाद के साथ तुलसी दल का प्रयोग अधिक शुभ फलदायी माना गया है। कहते हैं कि जिस घर में तुलसी का पौधा बिना किसी विशेष श्रम के वृद्धि करता है, वहाँ सुख, समृद्धि, शांति और संपन्नता बनी रहती है तथा अगर भवन में किसी प्रकार का वास्तु दोष है तो वह भी दूर हो जाता है।
तुलसी में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के साथ-साथ त्रिदेवी महालक्ष्मी, महाकाली तथा सरस्वती का वास होता है। नारद पुराण में कहा गया है कि तुलसी के पौधे पर जल अर्पित करने वाला, तुलसी के पौधे के मूल भाग की मिट्टी का तिलक लगाने वाला, तुलसी के चारों ओर कांटों का आवरण या चारदीवारी बनवाने वाला और तुलसी के कोमल दलों से भगवान विष्णु के चरण कमलों की पूजा करने वाला मनुष्य जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर विष्णु लोक को प्राप्त होता है। ब्राह्मणों को कोमल तुलसी दल अर्पित करने वाले मनुष्य को तीन पीढ़ियों के साथ ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है इसलिए तुलसी लगाते समय पवित्रता का ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए। अपवित्र अथवा दूषित स्थान पर तुलसी लगाने से दोष होता है। तुलसी के पौधे को कभी भी झूठे एवं गंदे हाथों से स्पर्श नहीं करना चाहिए।
घर में तुलसी का पौधा सदैव पूर्व अथवा उत्तर दिशा में ही लगाना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार दक्षिण दिशा में तुलसी लगाना दोषपूर्ण है। तुलसी में जो भी खाद और पानी दिया जाए वह शुद्ध एवं पवित्र हो। तुलसी के पौधे से तुलसी दल लेते समय जूते या चप्पल न पहनें तथा मन में शुद्ध भाव रखते हुए तुलसी को हाथ जोड़कर प्रणाम करके ही तुलसी दल तोड़ें। परंतु सूर्य देवता के अस्त होने के बाद, घर में किसी का जन्म या मृत्यु होने पर सूतक के दौरान, संक्रांति, अमावस्या, द्वादशी और रविवार के दिन तुलसी दल नहीं लेना चाहिए।
घर में लगी हुई तुलसी पर नियमित रूप से जल अर्पित करने तथा प्रातः एवं सायं शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करने से सभी कष्ट एवं समस्याओं का निवारण होता है तथा घर-परिवार में सुख, समृद्धि और स्नेह-प्रेम में वृद्धि होती है।

पतन से कैसे बचे ?

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patan se kaise bache

आसुरी बुद्धि, मोहिनी बुद्धि, राक्षसी बुद्धि… वो मनुष्यों को गिरा देती है | इसलिए दीक्षा लेते तो १० माला नियमपूर्वक जपे तो गिराने का प्रारब्ध आयेगा तो फिर भी सुरक्षित हो जाएगा | १० से २० माला जो जपता है ना उसको गिराने की परिस्थिति भगा देगी लेकिन फिर खड़ा हो जाएगा | जप छोड़ दिया तो उसको तो गिरना ही है ना …गुरुमंत्र, गुरुध्यान छोड़ दिया गिरना ही गिरना | नहीं तो गुरुमंत्र और गुरुध्यान कितना ही गिरा दे कोई… उसको उठा लेगा |

“सत्य तो सत्य है ” श्री रमण महर्षि पुण्यतिथि १४ अप्रैल

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raman maharshi

(श्री रमण महर्षि पुण्यतिथि : १४ अप्रैल)
एक बार रमण महर्षि को कुछ लोग खूब रिझा-रिझाकर अपने गाँव में ले गये । रमण महर्षि जैसे ब्रह्मवेत्ता साक्षात्कारी महापुरुष आ रहे हैं, यह जानकर गाँववालों ने अपनी एडी-चोटी का जोर लगाकर उनके स्वागत की तैयारियाँ कीं । बडा विशाल मंच तैयार किया गया ।
लोग उनके दर्शन पाकर कृतार्थ हो गये । रमण महर्षि बहुत कम बोलते थे । उन्होंने थोडे-से ही शब्द कहे तो तालियों की गडग डाहट से गगनमंडल गूँज उठा । यह देखकर वे तुरंत मंच से उतर पडे और खूब रोये । स्व. प्रधानमंत्री श्री मोरारजीभाई देसाई जिनके श्रीचरणों में जाकर बैठते थे, ऐसे उच्च कोटि के संत यदि रोने लग जायें तो लोगों को आश्चर्य होना स्वाभाविक है । लोगों ने पूछा : ‘‘भगवन् ! क्या बात है ? आप क्यों रो पडे ?
रमण महर्षि : ‘‘गलती हो गयी ।
लोग : ‘‘गलती ! कैसी गलती ?
रमण महर्षि : ‘‘तुम लोगों ने इतनी सारी तालियाँ बजार्इं । जरूर मेरे से कोई गलती हो गयी
लोग : ‘‘नहीं नहीं, आप इतना अच्छा बोले, इसीलिए हम लोगों ने तालियाँ बजार्इं ।
रमण महर्षि : ‘‘तुम लोग जीते हो मिथ्या में । मिथ्या में जीनेवाले लोगों को कोई बात अच्छी लगी है तो इसका मतलब यह है कि मैं सत्य से नीचे आया हूँ । मिथ्यावालों की लाइन में आया हूँ, तभी तुम्हें बात अच्छी लगी है । हे परमात्मा ! मुझे क्षमा करना ।
लोकानुरंजन परमार्थ नहीं है । बहुत लोग किसीको मानते हैं एवं उनका आदर करते हैं, इसलिए वे महात्मा हैं- ऐसी बात नहीं है । सद्गुरु या सत्य का साक्षात्कार किये हुए महापुुरुष आपको जितना जान सकते हैं, उतना और सब मिलकर भी नहीं जान सकते । जैसे, दसवीं कक्षा के लाखों विद्यार्थी उतना नहीं जान सकते, जितना प्रोफेसर जान सकता है । यही बात सद्गुरु एवं शिष्य के विषय में समझनी चाहिए ।
लोगों की वाहवाही से सत्य की कसौटी नहीं होती । धन-वैभव से भी सत्य को नहीं मापा जा सकता और न ही सत्ता द्वारा सत्य को मापना संभव है । सत्य तो सत्य है । उसे किसी भी असत्य वस्तु से मापा नहीं जा सकता ।
माँ आनंदमयी के पास इन्दिरा गाँधी जाती थीं, इसलिए माँ आनंदमयी बडी हैं-ऐसी बात नहीं है । वे तो हैं ही बडी, बल्कि यह इन्दिरा गाँधी का सौभाग्य था कि ऐसी महान् विभूति के पास वे जाती थीं । रमण महर्षि के पास मोरारजीभाई जाते थे तो इससे रमण महर्षि बडे थे, ऐसी बात नहीं है वरन् मोरारजीभाई का सौभाग्य था कि उनके श्रीचरणों में बैठकर वे अपना भाग्य बनाते थे ।
लोग यदि ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों को जानते-मानते हैं तो यह लोगों का सौभाग्य है । कई ऐसे लोग हैं जिन्हें लाखों लोग जानते हैं, फिर भी वे ऊँची स्थिति में नहीं होते । कई ऐसे महापुरुष होते हैं जिन्हें उनके जीवनकाल में लोग उतना नहीं जानते जितना उनके देहावसान के बाद जानते हैं । भारत में तो ऐसे कई महापुरुष हैं जिन्हें कोई नहीं जानता, जबकि वे बडा ऊँचा जीवन जीकर चले जाते हैं ।
जैसे प्रधानमंत्री आदिवासियों के बीच आकर उन्हीं के जैसी वेशभूषा में रहें तो उनकी योग्यता को आदिवासी क्या जान पायेंगे ? वे तो उनके शरीर को ही देख पायेंगे । उनकी एक कलम से इन्कमटैक्स के कितने ही नियम बदल जाते हैं, कितने ही सेठों की नींद हराम हो जाती है । इस बात का ज्ञान आदिवासियों को नहीं हो पायेगा । ऐसे ही ज्ञानी महापुुरुष भी स्थूल रूप से तो और लोगों जैसे ही लगते हैं, खाते-पीते, लेते-देते दिखते हैं किन्तु उनकी सूक्ष्म सत्ता का बयान कर पाना संभव ही नहीं है । किसीने ठीक ही कहा है :
पारस अरु संत में बडा अंतरहू जान । एक करे लोहे को कंचन ज्ञानी आप समान ।।
पारस लोहे को स्वर्ण तो बना सकता है किन्तु उसे पारस नहीं बना सकता, जबकि ज्ञानी पुरुष व्यक्ति को अपने ही समान ज्ञानी बना सकता है ।
ईश्वर दर्शन देने के लिए तैयार हैं, गुरु समर्थ हैं तो फिर हम देर क्यों करें ? यदि दर्शन करते-करते मर भी गये तो मरना सफल हो जायेगा एवं दर्शन के बाद जिये तो जीना भी सफल हो जायेगा ।
ऐसे ही प्रसिद्ध-अप्रसिद्ध ब्रह्मज्ञानी संतों का दर्शन व सत्संग करते-करते मर भी गये तो अमर पद के द्वार खुल जाएँगे और जीते रहे तो भी समय पाकर जीवन्मुक्त हो जाएँगे ।
(ऋषि प्रसाद : दिसम्बर १९९८)
* लोगों की वाहवाही से सत्य की कसौटी नहीं होती । धन-वैभव से भी सत्य को नहीं मापा जा सकता और न ही सत्ता द्वारा सत्य को मापना संभव है । सत्य तो सत्य है । उसे किसी भी असत्य वस्तु से मापा नहीं जा सकता ।

बाल्यकाल में ही विवेक

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pujya bapuji

गुरू नानक जी ​के पास कथा में एक लड़का प्रतिदिन आकर बैठ जाता था। एक दिन नानक जी ने उससे पूछाः “बेटा ! कार्तिक के महीने में सुबह इतनी जल्दी आ जाता है, क्यों ?”वह बोलाः “महाराज ! क्या पता कब मौत आकर ले जाये ?”नानक जीः “इतनी छोटी-सी उम्र का लड़का ! अभी तुझे मौत थोड़े मारेगी ?अभी तो तू जवान होगा, बूढ़ा होगा, फिर मौत आयेगी।”लड़काः “महाराज ! मेरी माँ चूल्हा जला रही थी। बड़ी-बड़ी लकड़ियों को आगने नहीं पकड़ा तो फिर उन्होंने मुझसे छोटी-छोटी लकड़ियाँ मँगवायी। माँ ने छोटी-छोटी लकड़ियाँ डालीं तो उन्हें आग ने जल्दी पकड़ लिया। इसी तरह हो सकता है मुझे भी छोटी उम्र में ही मृत्यु पकड़ ले। इसीलिएमैं अभी से कथा में आ जाता हूँ।”नानकजी बोल उठेः “है तो तू बच्चा,लेकिन बात बड़े-बुजुर्गों की तरह करता है। अतः आज से तेरा नाम ‘भाई बुड्ढा’ रखते हैं।’उन्हीं भाई बुड्ढा को गुरू नानक के बाद उनकीगद्दी पर बैठने वाले पाँच गुरूओंको तिलक करने का सौभाग्य मिला। बाल्यकाल में ही विवेक था तो कितनी ऊँचाई पर पहुँच गये !