मन एक कल्पवृक्ष

Posted on

pujya bapuji

कोई सुप्रसिद्ध वैद्यराज थे। रात्रि को किसी बूढ़े आदमी की तबीयत गम्भीर होने पर उन्हें बुलाया गया। वैद्यराज ने देखा कि’बूढ़ा है, पका हुआ पत्ता है, पुराना अस्थमा है, फेफड़े इन्कार कर चुके हैं, रक्तवाहिनियाँ भी चोड़ी हो गयी है, पुर्जे सब पूरे घिस गये हैं अब बूढ़े का बचना असम्भव है, बहुत-बहुत तो 40 से 48 घंटे निकाल सकता है। वैद्य ने ठीक से जाँच की। बड़ा सात्त्विक वैद्य था, अच्छी परख थी उसकी।

बूढ़े ने कहाः “बताओ मेरा क्या होगा ? कोई दवाई लगती नहीं, दो साल से पड़ा हूँ बिस्तर पर, ऐसा है-वैसा है….।”

वैद्य ने कहाः “चिंता न करो। मैं जाता हूँ, जाँच पड़ताल करके चिट्ठी भेजता हूँ और दवाई भी भेजता हूँ।”

वैद्य अपने घर की ओर लौटा। रास्ते में याद आया कि ‘धनी सेठ का लड़का जो बीमार है, दवाई मँगा रहा था, जरा उसे देखता जाऊँ।’

वैद्य ने युवक को देखा। युवक भी बिस्तर पर कराह रहा था कि “मेरी तबीयत खराब है, कमजोरी है, मेरे को ऐसा है वैसा है…। क्या पता कब ठीक होऊँगा ?”

वैद्य ने कहाः “चिंता की बात नहीं, ठीक हो जाओगे। तुमको बीमारी का वहम ज्यादा है, वहम निकाल दो।”

बोलेः “मुझे रोग क्या है यह तो बताओ वैद्यराज ?”

वैद्यराज ने कहाः “मैं अभी जाता हूँ, अपने औषधालय से पूरा विश्लेषण करके तुमको चिट्ठी भी भेजता हूँ, दवाई भी भेजता हूँ।”

वैद्य ने दो चिट्ठियाँ लिखीं और दोनों की दवाइयाँ साथ में भेज दीं। अब  जो चिट्ठी और दवाई जवान को देनी थी वह बूढ़े के पास पहुँच गयी और जो बूढ़े को देनी थी वह गलती से जवान को मिल गयी। उस चिट्ठी में बूढ़े के लिये लिखा थाः “शरीर का कोई भरोसा नहीं। पद का भी कोई भरोसा नहीं। शरीर का ही भरोसा नहीं तो पदों का भरोसा कैसे ! सारे पद शरीर पर आधारति हैं। जितना हो सके हरि स्मरण करो और अपनी धन सम्पत्ति बच्चों के हवाले करने के लिए तुम्हारे अंदर थोड़ी शक्ति आ जाये, ऐसी उत्तेजक दवा भेजता हूँ। परमात्मा का खूब सुमिरन करो, शरीर तो किसी का सदा रहा नहीं ! भगवान हरि ही तुम्हारी शरण हैं, अंतिम गति हैं। संसार में अब तुम्हारे ज्यादा दिन नहीं हैं। एक दो दिन के तुम मेहमान हो।”

जवान ने ज्यों चिट्ठी पढ़ी महाराज ! ऐसा ढला कि फिर उठ न सका। करवट बदलने के लिए पत्नी को बुलाया। रात भर चीखा-चिल्लाया। सुबह होते-होते आदमी वैद्यराज को बुलाने गयेः

“हालत गम्भीर है, चलो।”

वैद्य ने कहाः “गम्भीर-वम्भीर कुछ नहीं, अब मेरे आने की कोई जरूरत नहीं। मैं कल देखकर आया हूँ। अभी मेरे पूजा-पाठ का समय है।”

नौकर ने जाकर कहाः “वैद्य बोलते हैं कि अब मेरे आने की जरूरत नहीं है।” जवान को लगा कि ‘सचमुच अब मैं जाने वाला हूँ, वैद्य आकर क्या करेगा !” उसकी तबीयत और खराब हो गयी। दोपहर तक उसकी ऐसी हालत हो गयी कि जैसे अब गया… अब गया…। वैद्य के मन में हुआ कि ‘आदमी पर आदमी आ रहे है। चलो, जरा देखकर आयें।’

वैद्यराज ने उस युवक को देखा और बोलेः “कल तक तो इस जवान की हालत ठीक-ठीक थी, अब ऐसी कैसे हो गयी ! क्या हो गया ?”

वह बोलाः “आप ही ने तो कहा कि, तुम एक दो दिन के मेहमान हो।’ रात को आपकी चिट्ठी पढ़ने से तो मेरी तबीयत और खराब हो गयी और मुझे तो सामने मृत्यु ही दिखती है कि मैं मर जाऊँगा। वैद्यराज ! मैंने अपने कुटुम्बियों को, ससुराल वालों को तार भेज दिये। मैं तुम्हारे पैर पकड़ता हूँ, वचन देता हूँ, मैं लिखकर दे दूँ कि मेरी धन-सम्पदा सब आपको अर्पण करता हूँ। मुझे ठीक कर दो, मुझे जीवन दे दो….।”

वह युवक ‘अब मरा ! अब मरा !’ – इसक प्रकार का विलाप कर रहा था। वैद्य ने चिट्ठी माँगी कि इतन कैसे लड़खड़ा गया !पढ़ी तो खूब हँसा। बोलाः “अरे ! यह तो कल मैं जिस बूढ़े को देखकर आया था, उसकी चिट्ठी है और यह उत्तेजक दवा उसके लिये है। तेरे को तो थोड़ा-सा बुखार है, तेरी दवा अलग है। उस आदमी ने बेवकूफी की जो तेरे को दे दी। मुझसे गलती हो गयी, अब ऐसे आदमियों के द्वारा चिट्ठी नहीं भिजवाऊँगा।”

वैद्य ने कुछ विश्वास की बातें सुनायीं तो वह उठ के खड़ा हो गया। बोलाः “अच्छा, ऐसी बात है !” वैद्य ने कहाः “हाँ, हाँ सचमुच !” वह खाना वाना खाकर बोलता हैः “अच्छा चलो, बूढ़े का हाल देखकर आयें। उसका क्या हुआ ?” वे दोनों उस बूढ़े के पास गये। वैद्य ने देखा कि इसका बिस्तर तो पहली मंजिल पर रहता था, यह अब नीचे कैसे आ गया ! जो अभी मरीज था, मर रहा था, पलंग पर से करवट बदलने के लिए जिसे स्त्री के सहयोग की जरूरत थी, देखा तो वह रसोई में रोटी और दूध खा रहा है। वैद्य को देखकर बूढ़ा बोल उठाः “मेरे वैद्यराज भगवान ! तुम्हारा भला हो। तुम्हारी दवा में तो क्या चमक थी ! तुम्हारी चिट्ठी पढ़ी कि’कोई खास रोग नहीं, जरा कमजोरी है। तुम तो बिना मतलब के वहम में फँसे हो।’ सचमुच, मैंने वहम छोड़ दिया और मुझमें शक्ति आ गयी। मैं गद्दे से उतरकर खाने आ गया हूँ लो !”

वह जवान बोलने ही जा रहा था कि ‘भाई ! वह तो मेरी चिट्ठी है।’ “वैद्यराज ने उसको संकेत कर दिया कि ‘चुप रहो अब !इधर तो काम बन गया !’ बूढ़ा बोलाः “वैद्यराज! दो साल से तो मैं दवाइयाँ कर रहा था। ऐसे लल्लू-पंजू वैद्यों के चक्कर में था कि बीमार-ही-बीमार रहा। तुम्हारे जैसे वैद्य की दवा पहले करता तो दो साल मुझे बिस्तर पर नहीं पड़े रहना पड़ता। वैद्यराज ! तुम्हारा मंगल हो, खूब जियो !”

वैद्य के वचन से जो बिस्तर पर था, वह व्यक्ति तीन महीने और जिया। ऐसे कई दृष्टांत तुमने समाज में देखे होंगे।

और एक्स रे करके लुटेरे डॉक्टर कितना तुम्हे नोच लेते हैं और कितना तुम्हें गहरा मरीज बना देते हैं ! यह है, वह है…. एक्स रे के काले पन्ने दिखाकर तुम्हें और तुम्हारे कुटुम्बियों को डरा के अपनी काली मुरादें पूरी कर लेते हैं।

दया बहन शेवानी का पुत्र, पति और दया बहन स्वयं थकी हारी थीं। लगता था कि अब जाने वाली हैं। वे लोग हमारे पास आये और अभी भी दया बहन जीवित हैं।

श्रीमती दया बहन, प्रह्लाद शेवानी और परिवार चकित हो रहा है कि ‘मृत्यु के मुख से बापू बाहर ले आये !’ मृत्यु के मुख से बाहर नहीं लाये, जिन्होंने लूटने के लिए धकेला था और जिन्हें ऑपरेशन करना था, उन शिकारियों के शिकंजे से बापू उनको बाहर ले आये और आश्रम के वैद्यों ने निष्काम भाव से थोड़ा इलाज किया। डॉक्टरों की अंग्रेजी औषधियों से सब बाल झड़ रहे थे, मुंडित-तुंदित लग रही थी। अब तो उन्हें नये काले बाल भी उभर रहे हैं। यह देखकर तो उनकी बहूरानी भी दंग रह गयी !

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम – ये छः सदगुण जहाँ रहते हैं, वहाँ परमात्मा पग-पग पर अपनी करूणा-कृपा छलकाते हैं, छलकाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।

जो डॉक्टर लापरवाही बरतते हैं या मरीज को डराते हैं और उनको लूटने का इरादा बनाते हैं, भगवान उनको सदबुद्धि दें। वे सुधर जायें, सुधरने का सीजन है।

तुम्हारे गहरे मन में इतना सामर्थ्य है कि ढले हुए शरीर को जीवन दे सकता है और जीवन वाले शरीर को ढला सकता है। तुम मन में जैसा दृढ़ संकल्प करो, वैसा होने लगता है।

मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः।

मन ही तुम्हारे बंधन और मुक्ति का कारण है। जैसा-जैसा आदमी सोचता है न, वैसा-वैसा बन जाता है। जो नकारात्मक सोचता है, घृणात्मक सोचता है उसको घृणा ही मिलती है और नकारा जाता है। जो वाह-वाह सोचता है, धन्यवाद सोचता है, ‘कर लूँगा, हो जायेगा…. हो जायेगा’ – ऐसा सोचता है, निराशा-हताशा की बातें नहीं सोचता उसके काम हो जाते हैं।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s