Month: July 2014

क्या है आपकी श्रद्धा का आधार ?

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आपकी श्रद्धा का आधार आपका अनुभव होना चाहिए | पूरी दुनिया और मीडियावाले कहे कि सूर्य अँधेरा फैलाता है, पानी से आग बढती है और पेट्रोल से आग शांत होती है, चिंटी हाथी से बड़ी होती है और चूहा शेर का शिकार कर सकता है तो क्या आप मान लोगे ? प्रमाण तो आधुनिक टेक्नोलोजी का उपयोग करके जैसे चाहो बना सकते है | बुद्ध को व्यभिचारी सिद्ध करने के लिए जेतवन में बुद्ध के निवास के पास से निंदकों ने बलात्कार करके एक वैश्या को मार कर गाड़ दी | बाद में वहाँ खोद कर प्रमाण दिखाया लोगों को क्या ऐसे प्रमाण आज का निंदक नहीं बना सकता ? मेरी श्रद्धा मेरे अनुभव पर आधारित है उसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी नहीं हिला सकते तो दूसरों की क्या बात है ?

राजा हरीश चन्द्र का राज्यदान

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विश्वामित्र ने राजा हरीशचन्द्र की परीक्षा लेने पृथ्वी-लोक में पहुंच गया| साधारण ब्राह्मण के वेष में विश्वामित्र राजा हरीश चन्द्र की नगरी में गया| राज भवन के ‘सिंघ पौड़’ पर पहुंच कर उस ने द्वारपाल को कहा-राजा हरीश चन्द्र से कहो कि एक ब्राह्मण आपको मिलने आया है|

द्वारपाल अंदर गया| उसने राजा हरीश चन्द्र को खबर दी तो वह सिंघासन से उठा और ब्राह्मण का आदर करने के लिए बाहर आ गया| बड़े आदर से स्वागत करके उसको ऊंचे स्थान पर बिठा कर उसके चरण धो कर चरणामृत लिया और दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना की-

हे मुनि जन! आप इस निर्धन के घर आए हो, आज्ञा करें कि सेवक आपकी क्या सेवा करे? किसी वस्तु की आवश्यकता हो तो दास हाजिर है बस आज्ञा करने की देर है|

‘हे राजन! मैं एक ब्राह्मण हूं| मेरे मन में एक इच्छा है कि मैं चार महीने राज करूं| आप सत्यवादी हैं, आप का यश त्रिलोक में हो रहा है| क्या इस ब्राह्मण की यह इच्छा पूरी हो सकती है|’ ब्राह्मण ने कहा|

सत्यवादी राजा हरीश चन्द्र ने जब यह सुना तो उसको चाव चढ़ गया| उसका रोम-रोम झूमने लगा और उसने दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना की-‘जैसे आप की इच्छा है, वैसे ही होगा| अपना राज मैं चार महीने के लिए दान करता हूं|’

यह सुन कर विश्वामित्र का हृदय कांप गया| उसको यह आशा नहीं थी कि कोई राज भी दान कर सकता है| राज दान करने का भाव है कि जीवन के सारे सुखों का त्याग करना था| उसने राजा की तरफ देखा, पर इन्द्र की इच्छा पूरी करने के लिए वह साहसी होकर बोला –

चलो ठीक है| आपने राज तो सारा दान कर दिया, पर बड़ी जल्दबाजी की है| मैं ब्राह्मण हूं, ब्राह्मण को दक्षिणा देना तो आवश्यक होता है, मर्यादा है|

राजा हरीश चन्द्र-सत्य है महाराज! दक्षिणा देनी चाहिए| मैं अभी खजाने में से मोहरें ला कर आपको दक्षिणा देता हूं|’

विश्वामित्र-‘खजाना तो आप दान कर बैठे हो, उस पर आपका अब कोई अधिकार नहीं है| राज की सब वस्तुएं अब आपकी नही रही| यहां तक कि आपके वस्त्र, आभूषण, हीरे लाल आदि सब राज के हैं| इन पर अब आपका कोई अधिकार नहीं|

राजा हरीश चन्द्र-‘ठीक है| दास भूल गया था| आप के दर्शनों की खुशी में कुछ याद नहीं रहा, मुझे कुछ समय दीजिए|’

विश्वामित्र-‘कितना समय?’

राजा हरीश चन्द्र – ‘सिर्फ एक महीना| एक महीने में मैं आपकी दक्षिणा दे दूंगा|’

विश्वामित्र-‘चलो ठीक है| एक महीने तक मेरी दक्षिणा दे दी जाए| नहीं तो बदनामी होगी कि राजा हरीश चन्द्र सत्यवादी नहीं है| यह भी आज्ञा है कि सुबह होने से पहले मेरे राज्य की सीमा से बाहर चले जाओ| आप महल में नहीं रह सकते| ऐसा करना होगा यह जरूरी है|

 

स्वस्थ जीवन प्राप्त करने की कुंजी

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स्वस्थ जीवन ही सफलता प्राप्त करने की कुंजी है।

स्वस्थ जीवन के लिए कुछ उपयोगी बातें इस प्रकार हैं-

पानी :-

  • सभी व्यक्तियों को स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन सुबह के समय में बिस्तर से उठकर कुछ समय के लिए पालथी मारकर बैठना चाहिए और कम से कम १ से ३ गिलास गुनगुना पानी पीना चाहिए या फिर ठंडा पानी पीना चाहिए।
  • स्वस्थ रहने के लिए प्रत्येक व्यक्तियों को प्रतिदिन कम से कम १० से १२ गिलास पानी पीना चाहिए।

महत्वपूर्ण क्रिया :-

  • सभी व्यक्तियों को स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन दिन में २ बार मल त्याग करना चाहिए।
  • सांसे लंबी-लंबी और गहरी लेनी चाहिए तथा चलते या बैठते और खड़े रहते समय अपनी कमर को सीधा रखना चाहिए।
  • दिन में समय में कम से कम २ बार ठंडे पानी से स्नान करना चाहिए।
  • दिन में कम से कम २ बार भगवान का स्मरण तथा ध्यान करें, एक बार सूर्य उदय होने से पहले तथा एक बार रात को सोते समय।

विश्राम :-

  • सभी मनुष्यों को भोजन करने के बाद मूत्र-त्याग जरूर करना चाहिए।
  • प्रतिदिन दिन में कम से कम १-२ बार ५ से १५ मिनट तक वज्रासन की मुद्रा करने से स्वास्थ्य सही रहता है।
  • सोने के लिए सख्त या मध्यम स्तर के बिस्तर का उपयोग करना चाहिए तथा सिर के नीचे पतला तकिया लेकर सोना चाहिए।
  • सोते समय सारी चिंताओं को भूल जाना चाहिए तथा गहरी नींद में सोना चाहिए और शरीर को ढीला छोड़कर सोना चाहिए।
  • पीठ के बल या दाहिनी ओर करवट लेकर सोना चाहिए।
  • सभी मनुष्यों को भोजन और सोने के समय में कम से कम ३ घण्टे का अन्तर रखना चाहिए।

 

कफ प्रकोप निराकरण उपाय

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कफ प्रकोप के लक्षण-

– शरीर भारी, शीतल, चिकना और सफेद होना।

– अंगों में शिथिलता व थकावट का अनुभव होना। आलस्य का बना रहना ।

– ठंड अधिक लगना ।

– त्वचा चिकनी व पानी में भिगी हुई सी रहना।

– मुंह का स्वाद मीठा और चिकना होना। मुंह से लार गिरना।

– भूख का कम लगना। अरुचि व मंदाग्नि।

– मल, मूत्र, नेत्र ओर सारे शरीर का सफेद पड़ जाना। मल में चिकनापन और आंव का आना।

कफ प्रकोप के कारण

– मीठे, खट्टे, नमकीन पदार्थो का अति सेवन।

– शीतल, चिकने भारी गाढ़े और गरिष्ठ पदार्थो का सेवन।

– अधिक मीठा, चिकना व ठंडा-बासी खाना।

– विरुद्ध आहार करना।

– भोजन के उपर भोजन करने या अजीर्ण में भोजन करना।

– दिन में ज्यादा सोना।

– परिश्रम या व्यायाम न करना।

– नमी वाले, दलदली, जलाशय और समुद्र के समीप वाले स्थानों में रहना।

कफवर्धक आहार का सेवन

जैसे – नए गेहूं की रोटी, चावल, जड़द, तिल, जैतून तेल, बादाम तेल । घी, मक्खन, पनीर,अधिक दही, दही की।

कफनाशक उपाय

–         कड़वे, चरपरे, कसैले रसयुक्त भोजन।

–         रूक्ष, हल्के, उष्ण पदार्थो का सेवन।

–         मेदोहर (मोटापा घटाने वाले) तथा कफनाशक औषधियों का सेवन जैसे त्रिफला-सेवन।

कफनाशक खाद्य-वस्तुएं:

पुराना गेहूं, जौ की रोटी, जौ, मूंग, मोठ, मसूर, चना, कुलथी, अलसी, तेल, सरसों तेल। बकरी का दूध, छाछ। नया शहद। बथुआ, टिण्डे, करेला, गाजर, खीरा, लहसुन, प्याज,अदरख, मूली का तेल में भुना शाक, सरसों के पतों का शाक। अनार, सेब, तरबूज, बेल,सूखे मेव

विशेष कफनाशक उपाय-

– वमन करना। जल नेति (योग-क्रियाएं) स्वेदन (पसीना लेना)।

– उपवास या अल्पाहार। दिन में एक बार भोजन करना या दो बार हल्का आहार करना। रात को देर से भोजन न करना।

– व्यायाम करना।

– दिन में सोने की आदत छोड़ना

– गर्म अथवा उबला हुआ पानी पीना।

– सर्दी-नमी से बचना। गर्म सा सीलन रहित घर में रहना।

– गर्म पानी से स्नान। धूप स्नान।

– गले में कफ का जमाव होने पर या दर्द होने पर गर्म पानी में नमक डालकर गरारें करना।

– लालच-लोभ की प्रवृति छोड़ना। मोह, भावुकता का परित्याग।

 

 

श्रीकृष्ण सुदामा मिलन प्रसंग

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भगवान श्रीकृष्ण सुदामा के चरण  धो रहे :
भगवान श्रीकृष्ण सुदामा के चरण धो रहे :

एक दिन सुदामा अपने मित्र श्री कृष्ण कि ओर चल पड़ा| उसकी पत्नी ने कुछ चावल, तरचौली उसको एक पोटली में बांध दिए| सुदामा मन में विचार करता कि मित्र को कैसे मिलेगा ? क्या कहेगा ? द्वारिका नगरी में पहुंच कर वह सुदामा ने डरते और कांपते हुए द्वारपाल को कहा’मैंने राजा जी को मिलना है|’

द्वारपाल-‘क्या नाम बताऊं जा कर?’

सुदामा ब्राह्मण आया है, आपके बचपन का मित्र| द्वारपाल यह संदेश लेकर अंदर चला गया| जब उसने श्री कृष्ण जी को संदेश दिया तो वह उसी पल सिंघासन से उठ कर नंगे पांव बाहर को भागे तथा बाहर आकर सुदामा को गले लगा लिया| कुशलता पूछी तथा बड़े आदर और प्रेम से उसे अपने सिंघासन पर बिठाया और उसके पैर धोए| पास बिठा कर व्यंग्य के लहजे में कहा “ मेरे लिए क्या लाया हैं ?”

यह कह कर श्री कृष्ण ने सुदामा के वस्त्रों से बंधी हुई पोटली खोल ली और फक्के मार कर चबाने लगे| चबाते हुए वर देते गए तथा कहते रहे, “वाह क्या ! स्वादिस्ट हैं | “

सुदामा प्रसन्न हो गया| श्री कृष्ण ने मित्र को अपने पास रखा तथा खूब सेवा की गई |कुछ दिनों बाद सुदामा वापिस घर को चल पड़ा| मार्ग में सोचता रहा कि घर जाकर अपनी पत्नी को क्या बताऊंगा ? मित्र से क्या मांग कर लाया हूं|

सुदामा गोकुल पहुंचा| जब वह अपने मुहल्ले में पहुंचा तो उसे अपना घर ही न मिला| वह वहां खड़ा हो कर पूछना ही चाहता था कि इतने में उसका लड़का आ गया| उसने नए वस्त्र पहने हुए थे|वो कहने लगा ‘पिताजी !’ द्वारिका से जिन आदमियों को आप ने भेजा था, वह यह महल बना गए हैं, सामान भी छोड़ गए हैं तथा बहुत सारे रुपये दे गए हैं| माता जी आपका ही इंतजार कर रहे हैं| आप आकर देखें कितना सुंदर महल बना है|’

वह समझ गया कि यह सब भगवान श्री कृष्ण की लीला है| श्री कृष्ण ने मुझे वहां अपने पास द्वारिका में रखा और मेरे पीछे से यहां पर यह लीला रचते रहे तथा मुझे बिल्कुल भी मालूम नहीं पड़ने दिया| | भगवान श्री कृष्ण की लीला देख कर सुदामा बहुत ही प्रसन्न था|

सुदामा की कंगालियत…

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श्रीकृष्ण सुदामा मिलन :-
श्रीकृष्ण सुदामा मिलन :-

सुदामा श्री कृष्ण जी के बालसखा हुए हैं|

सुदामा और कृष्ण जी का आपस में अत्यन्त प्रेम था, वह सदा ही इकट्ठे रहते| जिस समय उनका गुरु उनको किसी कार्य के लिए भेजता तो वे इकट्ठे चले जाते, बेशक नगर में जाना हो या किसी जंगल में लकड़ी लेने| दोनों के प्रेम की बहुत चर्चा थी|

सुदामा जब पढ़ने के लिए जाता था तो उनकी माता उनके वस्त्र के पलड़े में थोड़े चावल, तरचौली  बांध देती थी| सुदामा उनको खा लेता था, ऐसा ही होता रहा|

एक दिन गुरु जी ने श्री कृष्ण और सुदामा दोनों को जंगल की तरफ लकड़ियां लेने भेजा| जंगल में गए तो वर्षा शुरू हो गई| वे एक वृक्ष के नीचे बैठ गए| वह श्री कृष्ण से छिपा कर चने खाने लगा| उसे इस तरह देख कर श्री कृष्ण जी ने पूछा, “मित्र ! तुम क्या खा रहे हो ?”

सुदामा से उस समय झूठ बोला गया| उसने कहा ”खा तो कुछ नहीं रहा, मित्र !”

उस समय सहज स्वभाव ही श्री कृष्ण जी के मुख से यह शब्द निकल गया -‘सुदामा एक मुठ्ठी चने के लिए अपने मित्र से झूठ बोल दिया|’

यह कहने की देर थी कि सुदामा के गले दरिद्र और कंगाली पड़ गई, कंगाल तो वह पहले ही था| मगर अब तो श्री कृष्ण ने वचन कर दिया था| यह वचन जानबूझ कर नहीं सहज स्वभाव ही श्री कृष्ण के मुख से निकल गया, पर सत्य हुआ| सुदामा और अधिक कंगाल हो गया|

स्मृतिवर्धक प्राणायम

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बायें पैर की एडी गुदा द्वार पे रख दें | जैसे सिद्ध आसन में बैठते है | दायने पाँव की एडी बायें पैर की जांघो पर लगा दें और  ठोडी छाती के तरफ कर दें | इसको जालंदर बंद बोलते है | इससे स्मृति गजब की बढती है |आँखे बंद कर दे … गहरा श्वास लें …. उसको रेचक बोलते है | फिर रोके … उसको कुंभक बोलते है और फिर पहले तो श्वास लें …छोड़े … छोड़ना रेचक है… लेना पूरक है … रोकना कुंभक है | तो रेचक, कुंभक, पूरक, कुंभक, रेचक अभ्यास करें और ये अभ्यास १५ – २० – २५ – ३० मिनट… एक घंटे तक बढ़ा सकते है आप | गजब की स्मृति बढ़ेगी और तन के कई रोग भी मिटेंगे और मानसिक तनाव भाग जायेगें |